यदि तुम्हारी अंतरात्मा सर्वदा रूपांतर के लिए अभीप्सा करती है तो बस उसी का अनुसरण तुम्हें करना होगा । भगवान को खोजना या यों कहें कि भगवान के किसी रूप कों चाहना — क्योंकि यदि किसी में रूपांतर साधित न हो तो वह संपूर्ण रूप से भगवान को उपलब्ध नहीं कर सकता–कुछ लोंगों के लिये पर्याप्त हो सकता है, पर उन लोगों के लिए नहीं हो सकता जिनकी अंतरात्मा की अभीप्सा पूर्ण दिव्य परिवर्तन साधित करने की है।
सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग – २)
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…