अहंकार का त्याग

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

बाह्य कर्मों में अहंकार प्रायः छिपा रहता है और बिना पते लगे स्वयं को संतुष्ट करता रहता है – लेकिन, जब साधना का दबाव पड़ता है, यह अपनी उपस्थिति जताने के लिए बाध्य होता है, तब जो करना है वह है – इसका त्याग कर देना और अपने-आपको इससे मुक्त कर लेना तथा अपने कर्म का लक्ष्य मात्र दिव्य प्रभु को बना लेना।

योग का वातावरण बनायें रखना आसान नहीं होता जब कोई लगातार उन लोगों के सम्पर्क में रहे जो दूसरी चेतना में निवास करते हैं – केवल तभी जब कि बाहर, और साथ ही साथ आन्तरिक चेतना में भी व्यक्ति पूर्ण आधार बना सके कि वह किसी भी परिवेश में योग के वातावरण को पूर्णतः बनाये रख सकता है।

संदर्भ : श्रीअरविंद अपने विषय में 

श्रीमाँ के विषय में

श्रीअरविंद और श्रीमाँ के दर्शन

यहाँ पर कुछ लोग आपको माताजी से महानतर क्यों मानते हैं ? क्या आप दोनों समान स्तर से नहीं हैं ? क्या मनुष्य की आँखों पर के पर्दा नहीं पड़ा है जो इस तरह के भेद करता है?

ये वे मन हैं जो केवल सतही चीजों को देखते हैं और उनके पीछे क्या है यह नहीं देख पाते ।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

दूर रह कर सहायता ग्रहण करना

श्रीअरविंद का चित्र

अगर वह दूर से सहायता ग्रहण नहीं कर सकता तो यहाँ रह कर योग जारी रखने की आशा कैसे कर सकता है? यह ऐसा योग है जो मौखिक निर्देशों या किसी बाहरी चीज़ पर नहीं बल्कि निर्भर करता है पूर्ण नीरवता में स्वयं को उद्घाटित करने और शक्ति तथा प्रभाव को ग्रहण करने पर। जो लोग दूर रह कर इसे ग्रहण नहीं कर सकते वे यहाँ भी उसे प्राप्त नहीं कर सकते। साथ ही, अपने अंदर निश्चलता, निष्कपटता, नीरवता, धीरज तथा लगन को प्रतिष्ठापित किए बिना यह योग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें बहुत-से कठिनाइयों का सामना करना होता है और उन पर पूरी तरह से और निश्चित रूप से विजय पाने में कई-कई वर्ष लग जाते हैं।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र अपने और आश्रम के विषय में 

आश्रम के दो वातावरण

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

आश्रम में दो तरह के वातावरण हैं, हमारा तथा साधकों का । जब ऐसे व्यक्ति जिसमें अनुभूति पाने की कुछ क्षमता हो, बाहर से यहाँ आते हैं तब वे यहाँ के वातावरण की गंभीर अचंचलता तथा शांति का अनुभव पाकर भौचक्के रह जाते हैं, बाद में जब साधकों से उनका मेल-जोल हो जाता है तब बहुत बार उनकी धारणा और वह प्रभाव धुंधला सा पड़ जाता है, क्योंकि बहुधा साधकों के वातावरण की उदासी या चंचलता के वे शिकार हो जाते हैं। हाँ, अगर वे श्रीमाँ के प्रति उद्घाटित रहें – जैसा कि उन्हें होना चाहिये – तब वे उसी अचंचलता तथा शांति में रहेंगे, उदासी या चंचलता उन्हें  छूं भी नहीं पायेगी।

संदर्भ : श्रीअरविंद अपने और आश्रम के विषय में