सच्चाई

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

सच्चाई का अर्थ है, अपनी सत्ता की सभी गतिविधियों को उस उच्चतम चेतना तथा उच्चतम सिद्धि तक उठाना जिन्हें पहले से ही प्राप्त कर लिया गया है।

सच्चाई हर एक से यही माँग करती है कि प्रत्येक अपनी समस्त सत्ता को – अपने सभी भागों तथा गतिविधियों के साथ – उस केंद्रीय भागवत इच्छा-शक्ति के साथ एकता तथा सामंजस्य में ढाले।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

काम करने का सही तरीक़ा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

काम में व्यवस्था और सामंजस्य होने चाहियें। जो काम यूँ देखने में बिलकुल नगण्य हो उसे भी पूर्ण पूर्णता के साथ, सफ़ाई, सुंदरता, सामंजस्य और सुव्यवस्था के साथ करना चाहिये।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

उदार हृदय

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

उदार हृदय हमेशा अपने पुराने दुर्व्यवहारों को भूल जाता है और दुबारा सामंजस्य लाने के लिए तैयार रहता है।

आओ, हम सब उसको भूल जायें जो अतीत में अंधकारमय और कुरूप रहा है, ताकि ज्योतिर्मय भविष्य को ग्रहण करने के लिए हम अपने-आपको तैयार कर सकें।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१७)

व्यवस्था

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ का चित्र

काम में व्यवस्था और सामंजस्य होने चाहियें। जो काम यूं देखने में बिलकुल नगण्य हो उसे भी पूर्ण पूर्णता के साथ, सफाई, सुंदरता, सामंजस्य और सुव्यवस्था के साथ करना चाहिये।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

सामंजस्य

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

विभिन्न मूल्य रखने वाले लोग एक साथ, सामंजस्य में कैसे रह सकते और काम कर सकते है ?

इसका समाधान यह है कि अपने अंदर गहराइयों में जाओ और उस जगह को पा लो जहां सभी भेद मिल कर सारभूत और शाश्वत ऐक्य का निर्माण करते है ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

ज्योतिर्मय भविष्य

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

उदार हृदय हमेशा पुराने दुर्व्यवहारों को भूल जाता है और दुबारा सामंजस्य लाने के लिए तैयार रहता है ।

आओ, हम सब उसको भूल जाएँ जो अतीत में अंधकारमय और कुरूप रहा है , ताकि ज्योतिर्मय भविष्य को ग्रहण करने के लिए हम अपने-आपको तैयार कर सकें ।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१७)

हिंसा का साधन

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

किसी उद्देश्य की विजय के लिए हिंसा कभी भी बहुत अच्छा साधन नहीं होती। कोई अन्याय द्वारा न्याय, घृणा द्वारा सामंजस्य प्राप्त करने की आशा कैसे कर सकता है ?

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-३)