प्रत्येक का अपना तरीका

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

प्रत्येक का साधना करने और भगवान तक जाने का अपना तरीक़ा होता है और दूसरे उसे कैसे करते हैं इसमें उसे माथापच्ची नहीं करनी चाहिये; उनकी सफलता, असफलता, उनकी कठिनाइयाँ, उनके भ्रम, उनका अहंकार और दम्भ सब कुछ का श्रीमाँ के साथ वास्ता है; माँ के अन्दर अनन्त धैर्य है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वे साधकों के दोषों को उचित ठहराती हैं या वे जो कुछ कहें उसे स्वीकार करती हैं। किसी भी कलह, प्रतिरोध या वाद-विवाद में माताजी किसी की तरफ़ नहीं होती,
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अगर वे लोग अनुचित बात कहें या करें तो उसे वे उचित ठहराती हैं। आश्रम या आध्यात्मिक जीवन कोई  ऐसा रंगमंच नहीं जहाँ कुछ की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी या यह प्रतियोगिता का कोई अखाड़ा नहीं जिसमें कुछ लोग अपने को दूसरों से श्रेष्ठतर घोषित कर दें। ये सारी चीजें साधारण मनुष्य के मनोभाव की सांसारिक खोजे हैं और इन्हें साधना के जीवन में भी लिये-लिये चलने की उनकी प्रवृत्ति होती है, लेकिन यह चीज़ों का आध्यात्मिक सत्य नहीं है।… माताजी साधकों की परस्पर आलोचनाओं पर न तो ध्यान देती हैं न ही कोई महत्त्व। केवल तभी जब साधक आध्यात्मिक स्तर से इन चीज़ों की तुच्छता देखे, यह सम्भव होता है कि वह इनका बहिष्कार कर, पथ पर सीधा कूच कर दे।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

एक ही चेतना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

माताजी की चेतना और मेरी चेतना के बीच का विरोध पुराने दिनों का आविष्कार था (जिसका कारण मुख्यतया ‘क्ष’, ‘त्र’ तथा उस समय के अन्य व्यक्ति थे)। यह विरोध उस समय पैदा हुआ जब आरम्भ में
यहाँ रहने वाले लोगों में से कुछ माताजी को पूर्ण रूप से नहीं पहचानते थे या उन्हें स्वीकार नहीं करते थे। और फिर उन्हें पहचान लेने के बाद भी वे इस निरर्थक विरोध पर अड़े रहे और उन्होंने अपने-आपको और दूसरों को बड़ी हानि पहुँचायी। माताजी की और मेरी चेतना एक ही है, एक ही भागवत चेतना दोनों में है, क्योंकि लीला के लिए यह आवश्यक है। माताजी के ज्ञान और उनकी शक्ति के बिना, उनकी चेतना के बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता। यदि कोई व्यक्ति सचमुच उनकी चेतना
को अनुभव करता है तो उसे जानना चाहिये कि उसके पीछे मैं उपस्थित हूँ, और यदि वह मुझे अनुभव करता है तो वैसे ही माताजी भी मेरे पीछे उपस्थित होती हैं। यदि इस प्रकार भेद किया जाये (उन लोगों के मन इन चीजों को इतने प्रबल रूप में जो आकार दे देते हैं उन्हें तो मैं एक ओर ही छोड़े देता हूँ), तो भला सत्य अपने-आपको कैसे स्थापित कर सकता है-सत्य की दृष्टि से ऐसा कोई भेद नहीं है।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

जीवन का एक लघु आकार

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

साधक को क्या होना चाहिये इसके बारे में मैं तुम्हारे भावों की क़दर करती हूँ और उस दृष्टिकोण से, तुम जो कहते हो वह बिलकुल सच है। लेकिन यह भली-भाँति जानी हुई बात है कि आश्रम में केवल साधक ही नहीं हैं। आश्रम जीवन का एक लघु आकार है जिसमें योगाभ्यास करने वाले संख्या में कम हैं, और अगर मैं यहाँ सिर्फ उन्हीं को रखू जो अपनी साधना में बिलकुल सच्चे और निष्कपट हैं, तो वस्तुतः, बहुत कम ही रह जायेंगे।

श्रीअरविन्द हमेशा हमें इस तथ्य की याद दिलाते हैं कि भगवान् हर जगह हैं और हर चीज़ में हैं, और हम सभी से सच्ची करुणा का अभ्यास करने को कहते हैं। यह बात बड़े ही सुन्दर ढंग से उस सूत्र में कही गयी है जिस पर मैं अभी-अभी टिप्पणी कर रही थी : “अपने-आपको निर्दय
होकर जाँचो, तब तुम औरों के प्रति अधिक उदार और दयालु होओगे।”

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

केवल मां की ओर ताको

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

किसी भी साधक को कभी भी अयोग्यता के और निराशाजनक विचारों  नहीं पोसना चाहिये-ये एकदम से असंगत होते हैं, क्योंकि व्यक्ति की निजी योग्यता तथा गुण उसे सफल नहीं बनाते बल्कि श्रीमां की कृपा, उनकी शक्ति तथा उस कृपा के प्रति अन्तरात्मा की स्वीकृति तथा मां की परमा शक्ति की उसके अन्दर क्रिया ही साधक को सफल बनाती हैं। अन्धकार-भरे इन सभी विचारों से मुंह मोड़ लो और केवल मां की ओर ताको, परिणाम तथा अपनी इच्छा की सफलता के लिए अधीर मत बनो, बल्कि श्रद्धा और विश्वास के साथ मां को पुकारो, उनकी क्रिया को अपने अन्दर शान्ति लाने दो और प्रार्थना करो कि चैत्य उद्घाटन तथा उपलब्धि के लिए तुम्हारी प्यास कभी न बुझने पाये। यह चीज निस्सन्देह
तथा निश्चित रूप से उस पूर्ण श्रद्धा तथा प्रेम को ले आयेगी जिसे तुम खोज रहे हो।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र 

बाहरी जगत से अलग

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

अगर मैं अपने-आपको इस बाहरी जगत् से एकदम अलग कर सकूँ, अगर मैं बिलकुल अकेला रह सकूँ तो मैं इस अवसाद को पूरी तरह वश में कर सकूँगा, जिसे अभी तक मैं झटक तक नहीं सकता।

यह बिलकुल भी ठीक नहीं है; सभी एकान्तवासियों, सभी तपस्वियों का अनुभव निर्विवाद रूप से इसके विपरीत प्रमाणित करता है। कठिनाई अपने अन्दर से, स्वयं अपनी प्रकृति से आती है और तुम जहां भी जाओ, जैसी भी परिस्थिति में क्यों न होओ, उसे अपने साथ लिये रहते हो। उनमें से बाहर निकलने का बस एक ही उपाय है-वह है कठिनाई पर विजय पाना, अपनी निम्न प्रकृति को जीतना। क्या यह अकेले में करने की अपेक्षा, जहां मार्ग पर प्रकाश डालने वाला, अनिश्चित पगों को राह दिखाने
वाला कोई न हो, यहां ज्यादा आसान नहीं है जहां ठोस और साकार सहायता प्राप्त है?

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

काम के बीच रह कर साधना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

तुम्हारे लिए यह बिलकुल सम्भव है कि तुम घर पर और अपने काम के बीच रह कर साधना करते रहो-बहुत-से लोग ऐसा करते है। आरम्भ में बस आवश्यकता यह है कि जितना अधिक सम्भव हो उतना माताजी का स्मरण करते रहो, प्रत्येक दिन कुछ समय हृदय में उनका ध्यान करो, अगर सम्भव हो तो भगवती माता के रूप में
उनका चिन्तन करो, अपने अन्दर उनको अनुभव करने की अभीप्सा करो, अपने कर्मों को उन्हें समर्पित करो और यह प्रार्थना करो कि वे आन्तरिक रूप से तुम्हें मार्ग दिखायें और तुम्हें संभाले रखें।

यह आरम्भिक अवस्था है और बहुधा इसमें बहुत समय लग जाता है, पर यदि कोई सच्चाई और लगन के साथ इस अवस्था में से गुजरता है तो मनोवृत्ति कुछ-कुछ बदलना आरम्भ कर देती है और साधक में एक नयी चेतना खुल जाती है जो अन्तर में श्रीमां की उपस्थिति के बारे में, प्रकृति में और जीवन में होने वाली उनकी
क्रिया के बारे में, अथवा सिद्धि का दरवाजा खोल देने वाली किसी अन्य आध्यात्मिक अनुभूति के बारे में अधिकाधिक सचेतन होना आरम्भ कर देती है।

संदर्भ : श्रीअरविंद के वचन 

ध्यान का मतलब

श्रीअरविंद का चित्र

तुम ध्यान किसे कहते हो? आखें बंद करके एकाग्र होने को? यह सच्ची चेतना को नीचे उतारने के तरीक़ों में से एक है। सच्ची चेतना के साथ एक हो जाना या उसके अवतरण को अनुभव करना ही एकमात्र महत्वपूर्ण चीज़ है और अगर वह रूढ़िगत तरीक़े के बिना आये, जैसा कि मेरे साथ हमेशा हुआ, तो बहुत ही अच्छा। ध्यान बस एक साधन या उपाय होता है। सच्ची गति तो तब होती है जब व्यक्ति चलते-फिरते, कार्य करते, बोलते हुए भी साधना करता रहे।

संदर्भ : श्रीअरविंद (खण्ड -३५)

सम्पूर्ण आत्मसमर्पण

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

एकदम आरम्भ से ही आत्मसमर्पण का पूर्ण होना सम्भव नहीं हैं न?

साधारण रूप में नहीं। इसमें थोड़ा-बहुत समय लगता है। परंतु कभी-कभी एकाएक परिवर्तन हो जाता है। इन सब चीज़ों को ब्योरेवार समझाने में बहुत अधिक समय लगेगा। तुम शायद ये जानते हो कि साधना की सभी परम्पराओं में यह कहा जाता था कि मनुष्य का स्वभाव बदलने के लिए ३५ वर्षों की आवश्यकता होती हैं! अतएव, एक क्षण में ही इसके हो जाने की आशा तुम्हें नहीं करनी चाहिये।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५०-१९५१

पिछले कर्म

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

क्या पिछले कर्म साधना के मार्ग में नहीं आयेंगे ?

तुम भूतकाल में जो कुछ भी रहे हो उसे भगवान के प्रति पूर्ण निवेदन पोंछ डालता है ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-३)

 

 

अहंकार का त्याग

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

बाह्य कर्मों में अहंकार प्रायः छिपा रहता है और बिना पते लगे स्वयं को संतुष्ट करता रहता है – लेकिन, जब साधना का दबाव पड़ता है, यह अपनी उपस्थिति जताने के लिए बाध्य होता है, तब जो करना है वह है – इसका त्याग कर देना और अपने-आपको इससे मुक्त कर लेना तथा अपने कर्म का लक्ष्य मात्र दिव्य प्रभु को बना लेना।

योग का वातावरण बनायें रखना आसान नहीं होता जब कोई लगातार उन लोगों के सम्पर्क में रहे जो दूसरी चेतना में निवास करते हैं – केवल तभी जब कि बाहर, और साथ ही साथ आन्तरिक चेतना में भी व्यक्ति पूर्ण आधार बना सके कि वह किसी भी परिवेश में योग के वातावरण को पूर्णतः बनाये रख सकता है।

संदर्भ : श्रीअरविंद अपने विषय में