काम के बीच रह कर साधना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

तुम्हारे लिए यह बिलकुल सम्भव है कि तुम घर पर और अपने काम के बीच रह कर साधना करते रहो-बहुत-से लोग ऐसा करते है। आरम्भ में बस आवश्यकता यह है कि जितना अधिक सम्भव हो उतना माताजी का स्मरण करते रहो, प्रत्येक दिन कुछ समय हृदय में उनका ध्यान करो, अगर सम्भव हो तो भगवती माता के रूप में
उनका चिन्तन करो, अपने अन्दर उनको अनुभव करने की अभीप्सा करो, अपने कर्मों को उन्हें समर्पित करो और यह प्रार्थना करो कि वे आन्तरिक रूप से तुम्हें मार्ग दिखायें और तुम्हें संभाले रखें।

यह आरम्भिक अवस्था है और बहुधा इसमें बहुत समय लग जाता है, पर यदि कोई सच्चाई और लगन के साथ इस अवस्था में से गुजरता है तो मनोवृत्ति कुछ-कुछ बदलना आरम्भ कर देती है और साधक में एक नयी चेतना खुल जाती है जो अन्तर में श्रीमां की उपस्थिति के बारे में, प्रकृति में और जीवन में होने वाली उनकी
क्रिया के बारे में, अथवा सिद्धि का दरवाजा खोल देने वाली किसी अन्य आध्यात्मिक अनुभूति के बारे में अधिकाधिक सचेतन होना आरम्भ कर देती है।

संदर्भ : श्रीअरविंद के वचन 

मैं तेरा होना चाहता हूँ

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ की कहानी

तुम्हारी चेतना की गहराइयों में तुम्हारे अंदर रहने वाले भगवान का मंदिर, तुम्हारा चैत्य पुरुष है। यही वह केंद्र है जिसके चारों ओर तुम्हारी सत्ता के इस सब विभिन्न भागों को, इन सब परस्पर-विरोधी गतियों को जाकर एक हो जाना चाहिये। तुम एक बार चैत्य पुरुष की चेतना को और उसकी अभीप्सा को पा लो तो इन संदेहों और कठिनाइयों को नष्ट किया जा सकता है। इस काम में कम या अधिक समय तो लगेगा, परंतु अंत में तुम अवश्य सफल होओगे। तुमने एक बार भगवान की ओर मुड कर कहा  : “मैं तेरा होना चाहता हूँ,” और भगवान ने “हाँ” कह दिया तो समस्त जगत तुमको उनसे अलग नहीं रख सकता। जब केंद्रीय सत्ता ने समर्पण कर दिया है तो मुख्य कठिनाई दूर हो जायेगी। बाह्य सत्ता तो एक जमी हुई पपड़ी की तरह है। साधारण लोगो में यह पपड़ी इतनी कठोर और मोटी होती है की इसके कारण वे अपने अंदर के भगवान से सचेतन नहीं हो पाते। परंतु यदि आन्तरपुरुष ने एक बार, क्षण-भर के लिए ही सही, यह कह दिया है : “मैं यहाँ हूँ और मैं तेरा हूँ” , तो मानो एक पूल बांध जाता है और यह पपड़ी धीरे-धीरे पतली-से-पतली पड़ती जाती है, और एक दिन आयेगा जब दोनों भाग पूर्ण रूप से जुड़ जाएँगे और आंतर तथा बाह्य दोनों एक हो जायेंगे।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९२९-१९३१

सच्ची करुणा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

साधक को क्या होना चाहिये इसके बारे में मैं तुम्हारे भावों की कदर करती हूँ और उस दृष्टिकोण से, तुम जो कहते हो वह बिलकुल सच है। लेकिन यह भली -भांति जानी हुई बात है कि आश्रम में केवल साधक ही नहीं हैं। आश्रम जीवन का एक लघु आकार है जिसमें योगभ्यास करने वाले संख्या में कम हैं, और अगर मैं यहाँ सिर्फ उन्हीं को रखूँ जो अपनी साधना में बिलकुल सच्चे और निष्कपट हैं, तो वस्तुतः, बहुत कम ही रह जायेंगे।

श्रीअरविंद हमेशा हमें इस तथ्य कि याद दिलाते हैं कि भगवान हर जगह हैं और हर चीज़ में हैं, और हम सभी से सच्ची करुणा का अभ्यास करने को कहते हैं। यह बात बड़े ही सुन्दर ढंग से उस सूत्र में कही गयी है जिस पर मैं अभी-अभी टिप्पणी कर रही थी : “अपने – आपको निर्दय होकर जाँचो, तब तुम औरों के प्रति अधिक उदार और दयालु होओगे। ”

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

उच्चतम सत्य को जीना

श्री माँ दिल्ली आश्रम के श्री सुरेन्द्रनाथ जौहर के साथ

सभी सिद्धान्त,  सभी शिक्षाएं अन्तिम विश्लेषण में बोलने या लिखने के तरीकों से बढ़कर और कुछ नहीं होती । यहा तक की ऊंचे-से-ऊंचे अंतर्दर्शन भी उनके साथ आने वाली उपलब्धि की शक्ति से बढ़कर और कुछ नहीं होते ।

उच्चतम सत्य को प्राप्त करने के उपाय या पद्धति के बारे में लिखी या पढ़ी गयी सैकड़ों पुस्तकों से बढ़कर है उच्चतम सत्य को जीना – भले वह मिनट भर के लिये क्यों न हो ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग -२)

 

 

अपात्रता का भाव

श्री माँ का मनोहर चित्र

अगर अपात्रता का भाव तुम्हें उमड़ती हुई कृतज्ञता से भर देता है और आनन्दातिरेक के साथ श्रीअरविन्द के चरणों पर डाल देता है तो जान लो कि यह सच्चे मूल स्रोत से आता है । इसके विपरीत यदि वह तुम्हें दीन-दु:खी बनाकर तुममें छिप जाने या भाग जाने का आवेग लाता है तो तुम निश्चित रूप से जान सकते हो कि इसका स्रोत विरोधी है । पहले की ओर तुम मुक्त रूप से खुल सकते हो, दूसरे को अस्वीकार करना चाहिये ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

शक्ति को खींचने की कोशिश

श्री माँ का चित्र

मैं तुम्हें एक चीज की सलाह देना चाहती हूँ । अपनी प्रगति की इच्छा तथा उपलब्धि की अभीप्सा में इसका ध्यान रखो कि कभी शक्तियों को अपनी ओर मत खींचो । अपने-आपको दे दो, निरंतर आत्म-विस्मृति द्वारा जितनी नि:स्वार्थता तुम प्राप्त कर सकते हों उतने निःस्वार्थ-भाव से अपने-आपको खोलो, अपनी ग्रहणशीलता को जितना अधिक हो सकें बढ़ाओ, परन्तु ‘शक्ति’ को अपनी ओर खींचने की कभी कोशिश मत करो, क्योंकि खींचने की इच्छा करना ही एक खतरनाक अहंकार है । तुम अभीप्सा कर सकते हो, अपने-आपको खोल सकते हो, अपने-आपको दे सकते हो पर लेने की इच्छा कभी मत करो । जब कुछ बिगड़ जाता है तो लोग ‘शक्ति’ को दोष देते हैं, पर इसके लिये उत्तरदायी शक्ति नहीं है; यह पात्र की महत्वाकांक्षा, अहंकार, अज्ञान और दुर्बलता है जो उत्तरदायी है ।

उदारता एवं पूर्ण नि:स्वार्थता के साथ अपने-आपको दे दो और अधिक गहरे अर्थ में तुम्हारे साथ कभी कुछ बुरा नहीं होगा । लेने की कोशिश करो और तुम खाई के मुंह पर होंगे ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५७-१९५८ 

 

मेरे आशीर्वाद बहुत भयंकर हैं 

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ का चित्र

मेरे आशीर्वाद बहुत भयंकर हैं । वे इसके लिए या उसके लिए, इस व्यक्ति या उस वस्तु के विरुद्ध नहीं होते । वे… या, अच्छा, मैं रहस्यवादी भाषा में कहूंगी :

  वे इसलिए हैं कि प्रभु की ‘इच्छा ‘ पूरी शक्ति और पूरे बल के साथ चरितार्थ हो । इसलिए यह जरूरी नहीं है कि हमेशा सफलता मिले । अगर प्रभु की ऐसी ‘ इच्छा ‘ हो तो असफलता भी हो सकतीं है । ओर ‘इच्छा ‘ प्रगति के लिए है, मेरा मतलब आन्तरिक प्रगति से है । अतः जो कुछ भी होगा अच्छे-से- अच्छे के लिए ही होगा ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग – १)