अच्छा यंत्र पर बुरा मालिक

श्रीअरविंद और श्रीमाँ के दर्शन

प्राण एक अच्छा यंत्र है पर बुरा मालिक है। यदि तुम इसे इसकी रुचि और अरुचि, इसकी मौजों, इसकी कामनाओं, इसके बुरे अभ्यासों का अनुसरण करने दो तो यह तुम्हारा मालिक बन जायेगा और सुख -शांति प्राप्त करना फिर संभव न रहेगा। उस समय यह तुम्हारा यंत्र नहीं बनता और न भागवत शक्ति का यंत्र बनता है, बल्कि अज्ञान की किसी शक्ति का अथवा किसी विरोधी शक्ति का भी यंत्र बन जाता है जो इसे पकड़ सकती और इसका उपयोग कर सकती है ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र 

बाहरी जगत से अलग

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

अगर मैं अपने-आपको इस बाहरी जगत् से एकदम अलग कर सकूँ, अगर मैं बिलकुल अकेला रह सकूँ तो मैं इस अवसाद को पूरी तरह वश में कर सकूँगा, जिसे अभी तक मैं झटक तक नहीं सकता।

यह बिलकुल भी ठीक नहीं है; सभी एकान्तवासियों, सभी तपस्वियों का अनुभव निर्विवाद रूप से इसके विपरीत प्रमाणित करता है। कठिनाई अपने अन्दर से, स्वयं अपनी प्रकृति से आती है और तुम जहां भी जाओ, जैसी भी परिस्थिति में क्यों न होओ, उसे अपने साथ लिये रहते हो। उनमें से बाहर निकलने का बस एक ही उपाय है-वह है कठिनाई पर विजय पाना, अपनी निम्न प्रकृति को जीतना। क्या यह अकेले में करने की अपेक्षा, जहां मार्ग पर प्रकाश डालने वाला, अनिश्चित पगों को राह दिखाने
वाला कोई न हो, यहां ज्यादा आसान नहीं है जहां ठोस और साकार सहायता प्राप्त है?

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

चारित्रिक बाधाएँ

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

प्रत्येक साधक नैसर्गिक रूप से कुछ ऐसी चारित्रिकताएँ लिए होता है जो साधना पथ पर बड़ी बाधा उपस्थित करती है, ये जिद के साथ टिकी रहती हैं। इन्हें पार किया जा सकता है बहुत बहुत समय बाद भी भीतर से दिव्यता की क्रिया के द्वारा …….  ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र 

अहंकार का त्याग

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

बाह्य कर्मों में अहंकार प्रायः छिपा रहता है और बिना पते लगे स्वयं को संतुष्ट करता रहता है – लेकिन, जब साधना का दबाव पड़ता है, यह अपनी उपस्थिति जताने के लिए बाध्य होता है, तब जो करना है वह है – इसका त्याग कर देना और अपने-आपको इससे मुक्त कर लेना तथा अपने कर्म का लक्ष्य मात्र दिव्य प्रभु को बना लेना।

योग का वातावरण बनायें रखना आसान नहीं होता जब कोई लगातार उन लोगों के सम्पर्क में रहे जो दूसरी चेतना में निवास करते हैं – केवल तभी जब कि बाहर, और साथ ही साथ आन्तरिक चेतना में भी व्यक्ति पूर्ण आधार बना सके कि वह किसी भी परिवेश में योग के वातावरण को पूर्णतः बनाये रख सकता है।

संदर्भ : श्रीअरविंद अपने विषय में 

सबसे गंभीर बाधा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ का चित्र

भौतिक चेतना के साथ सम्बंध रखने वाली किसी भी चीज़ के लिए लोभ, तथाकथित आवश्यकताओं और किसी भी प्रकार के आराम के लिए लोभ – यह साधना मार्ग की सबसे गंभीर बाधाओं में से एक है ।

लोभ से तुम जो भी छोटी-मोती तुष्टियाँ पाते हो उनमें से हर एक लक्ष्य की ओर एक पग पीछे हटना है ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)