अग्नि परीक्षा

श्री माँ श्रीअरविंद आश्रम की

सभी अग्नि-परीक्षाओं के लिए कृतज्ञ होओ क्योंकि वे भगवान की ओर ले जाने वाले छोटे-से-छोटे रास्ते हैं।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग – २)

भगवान तथा औरों के प्रति कर्तव्य

श्री माँ और श्रीअरविंद का चलचित्र

जिसने एक बार अपने-आपको भगवान् के अर्पण कर दिया उसके लिए इसके सिवा कोई और कर्तव्य नहीं रहता कि वह अपने समर्पण को अधिकाधिक पूर्ण बनाये । संसार और उसमें रहने वाले मनुष्यों ने हमेशा मानव अर्थात् सामाजिक और पारिवारिक कर्तव्यों को भगवान् के प्रति कर्तव्य के पहले रखना चाहा है । उन्होंने भगवान् के प्रति कर्तव्य को अहंकार कहकर कलंकित किया है । वे दूसरी तरह से मूल्यांकन कर ही कैसे सकते थे जिन्हें भगवान् की वास्तविकता का कोई अनुभव नहीं है ? लेकिन भगवान् की दृष्टि में उनकी राय का कोई मूल्य नहीं है, उनकी इच्छा में कोई शक्ति नहीं है । वे अज्ञान की गतिविधियां हैं, उससे बढ़कर कुछ नहीं । तुम्हें उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश न करनी चाहिये और सबसे बढ़कर यह कि तुम्हें अपने-आपको प्रभावित होने या डिगने न देना चाहिये । तुम्हें अपने-आपको सावधानी के साथ समर्पण के एकान्त में बन्द कर लेना चाहिये और केवल भगवान् से ही सहायता, संरक्षण, पथ-प्रदर्शन और अनुमोदन की अपेक्षा रखनी चाहिये । जिसे मालूम हो कि उसे भगवान् की स्वीकृति और उनका समर्थन प्राप्त है उसे सारे संसार द्वारा निन्दित होने की परवाह नहीं होती ।

इसके अतिरिक्त क्या मानवजाति ने अपने अस्तित्व की व्यवस्था में अपनी पूर्ण अक्षमता प्रमाणित नहीं कर दी है ? सरकारों के बाद सरकारें आती हैं,राज्यों के बाद राज्य बदलते हैं, सदियों पर सदियां बीतती जाती हैं परन्तु मानव दुर्दशा शोचनीय रूप में वह-की-वही बनी रहती है । जब तक मनुष्य जो है वह-का-वही बना रहेगा यानी अंधा और अज्ञानी तथा समस्त आध्यात्मिक वास्तविकता के प्रति बन्द, तब तक यह दुर्दशा भी वैसी ही बनी रहेगी । रूपान्तर करके और मानव चेतना को आलोकित करके ही मानव जाति की अवस्था में सच्चा सुधार लाया जा सकता है । अत: मानव जीवन के दृष्टिकोण से भी यही तर्क-संगत ठहरता है कि मनुष्य का पहला कर्तव्य यह है कि वह दिव्य चेतना को खोजे और प्राप्त कर ले ।

 

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग -२)

दूसरें लोग आईना है

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

जब कोई बात दूसरे व्यक्ति के अन्दर तुम्हें एकदम अवांछनीय या हास्यास्पद प्रतीत हो — जब तुम सोचो : ”यह कैसी बात है! वह तो वैसा है, वह उस तरह का आचरण करता है, वह ऐसी बातें कहता है, वह ऐसा करता है” –, तब तुम्हें अपने-आपसे कहना चाहिये : ”हां, हां, परन्तु मै भी शायद बिना. जाने वही चीज करता हूँ  । अच्छा हो कि में दूसरे व्यक्ति की आलोचना करने से पहले सर्वप्रथम स्वयं अपने अन्दर दृष्टि डालूं ताकि मैं नि:संदिग्ध हो सकूं कि मैं भी मात्र थोड़े-से अन्तर के साथ, वही चीज नहीं करता ।” और , जब-जब तुम्हें दूसरे व्यक्ति का आचरण बुरा लगे तब-तब यदि तुम इसे सामान्य बुद्धि ओर समझदारी के साथ कर सको तो तुम देखोगे कि जीवन में दूसरों के साथ का सम्बन्ध मानों एक आईना है जो हमारे सामने इसलिये रखा गया है कि हम अधिक आसानी से और अधिक सूक्ष्म दृष्टि से उस दुर्बलता को देख सकें जिसे हम अपने अन्दर वहन करते है ।

संदर्भ : विचार और सूत्र के प्रसंग में 

श्रीअरविंद की उपस्थिति

महर्षि श्रीअरविंद का चित्र

श्रीअरविन्द निरन्तर हमारे साथ हैं और जो लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए तैयार हैं उनके आगे अपने- आपको प्रकट करते हैं ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग – १) 

बच्चों के साथ व्यवहार

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

बालक जब उत्साह से भरा हो तो उस पर कभी पानी न फेरो । उससे कभी यह न कहो, ”देखो, जीवन इस प्रकार का नहीं है । ” बल्कि तुम्हें उसको उत्साहित करना चाहिये, उससे कहना चाहिये, ”हां, अभी तो चीज़ें बेशक उस प्रकार की नहीं है, वे कुरूप प्रतीत होती हैं, परंतु इनके पीछे एक सौंदर्य है जो अपने-आपको प्रकट करने का प्रयत्न कर रहा है । उसी के लिये प्रेम पैदा करो, उसी को आकर्षित करो । उसी को अपने सपनों ओर महत्वाकांक्षाओं का विषय बनाओ ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५७-१९५८

गुरु का मानव रूप

श्री माँ और श्रीअरविंद

अगर तुम्हारे अन्दर श्रद्धा और विश्वास है, तो तुम गुरु के मानव रूप की पूजा नहीं करते बल्कि उन परम प्रभु को पूजते हो जो उनके द्वारा प्रकट होते हैं । परेशान मत होओ और जिस रास्ते से तुम्हें सहायता मिले उससे अपने-आपको पूरी तरह परम प्रभु को दे दो ।

 संदर्भ : माताजी के वचन (भाग – २) 

भूतकाल की लहरें 

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

भूतकाल की लहरों को अपने पास से बह कर दूर चले जाने दो, जो समस्त आसक्तियों और समस्त दुर्बलताओं को भी अपने साथ बहा ले जायें ।  भागवत चेतना का आलोकमय आनन्द उनका स्थान लेने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग – १) 

विरोधी शक्तियों का अस्तित्व

Sri Aurobindo Ashram

विरोधी शक्तियों को संसार में इसीलिए सहा जाता है क्योंकि वे मनुष्य की सच्चाई की परख करती हैं । जिस दिन मनुष्य पूरी तरह सच्चा हो जायेगा वे चली जायेंगी, क्योंकि तब उनके अस्तित्व का कोई कारण न रह जायेगा ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग – १) 

भौतिक मन का कार्य

श्री माँ श्री अरविंद आश्रम पुडुचेरी

भौतिक मन का एक प्रमुख कार्य है सन्देह करना । अगर तुम उस पर कान दो तो वह सन्देह के हजारों कारण ढूंढ निकालेगा। लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिये कि भौतिक मन अज्ञान में काम करता है और पूरी तरह मिथ्यात्व से भरा है ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग – २)