सामान्य प्रक्रिया

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

श्रीअरविंद कहते है की तुम्हें सबसे पहले अपने विषय में सचेतन होना चाहिए, फिर सोचना , और फिर कार्य करना चाहिये। सभी कार्यों से पहले सत्ता के आन्तरिक सत्य का अंतर्दर्शन प्राप्त होना चाहिये; सर्वप्रथम सत्य का अंतर्दर्शन , फिर इस सत्य का विचार-रूप में सूत्रीकरण, फिर विचार द्वारा कर्म का सृजन होना चाहिये।

यही है सामान्य प्रक्रिया ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५६

बंदीगृह और ध्यान-मंदिर

Sri Aurobindo

” जब मैं ‘अज्ञान’ में सोया पड़ा था,

तो मैं एक ऐसे ध्यान-कक्ष में पहुंचा

जो साधू-संतों से भरा था |

मुझे उनकी संगति उबाऊ लगी और

स्थान एक बंदीगृह प्रतीत हुआ;

जब मैं जगा तो

भगवान् मुझे एक बंदीगृह में ले गये

और उसे ध्यान-मंदिर

और अपने मिलन-स्थल में बदल दिया | ”

संदर्भ: कारावास की कहानी 

 

अचंचलता की अवस्था

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

अचंचलता उस अवस्था को कहते हैं जब मन या प्राण विक्षुब्ध, अशांत तथा विचारों और भावनाओं के द्वारा बहिर्गत या परिपूर्ण न हों । विशेषत. जब दोनों (मन और प्राण) ही अनासक्त होते और इन सबको एक उपरितलीय क्रिया के रूप मे देखते हैं तो हम कहते हैं कि मन या प्राण अचंचल है।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग – २)

अचंचल मन का अर्थ

Sri Aurobindo photographed in his room

अचंचल मन का अर्थ यह नही है कि उसमें कोई विचार या मनोमय गतियाँ एक- दम होगी ही नही, बल्कि यह अर्थ है कि ये सब केवल ऊपर-ही-ऊपर होंगी और तुम अपने अन्दर अपनी सत्य सत्ता को इन सबसे अलग अनुभव करोगे, जो इन सबको देखती तो है पर इनके प्रवाह में बह नही जाती, जो यह योग्यता रखती हैं कि इन सबका निरीक्षण करे और निर्णय करे तथा जिन चीजों का त्याग करना हो उन सबका त्याग करे एवं जो कुछ सत्य चेतना और सत्य अनुभूति हो उन सबको ग्रहण और धारण करे ।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के वचन (भाग – २)

साधना में दृढ़ आधार

महर्षि श्रीअरविंद का चित्र

समता के बिना साधना में दृढ़ आधार नहीं बन सकता। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी अप्रिय हों, दूसरों का व्यवहार चाहे कितना भी अरुचिकर हो, तुम्हें पूर्ण स्थिरता के साथ तथा किसी विक्षुब्धकारी प्रतिक्रिया के बिना उन्हें ग्रहण करना होगा। ये चीजें समता की कसौटी हैं। जब चीजें ठीक-ठाक हों तथा लोग और परिस्थितियाँ सुखद हों तब स्थिर-चित्त रहना आसान है। जब ये प्रतिकूल हों तब स्थिरता, शान्ति, समता की जाँच की जा सकती है, उन्हें सुदृढ़ तथा पूर्ण बनाया जा सकता है ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र भाग – २

अभीप्सा का तात्पर्य

Sri Aurobindo in his room

अभीप्सा का तात्पर्य है, शक्तियों को पुकारना । जब शक्तियाँ प्रत्युत्तर दे देती हैं, तब शान्त-स्थिर ग्रहणशीलता की, एकाग्र पर स्वतःस्पर्श ग्रहणशीलता की एक स्वाभाविक स्थिति उत्पन्न हो जाती है ।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र ( भाग-२)

 

अंतरात्मा का अनुसरण

महर्षि श्रीअरविंद का चित्र

यदि तुम्हारी अंतरात्मा सर्वदा रूपांतर के लिए अभीप्सा करती है तो बस उसी का अनुसरण तुम्हें करना होगा । भगवान को खोजना या यों कहें कि भगवान के किसी रूप कों चाहना — क्योंकि यदि किसी में रूपांतर साधित न हो तो वह संपूर्ण रूप से भगवान को उपलब्ध नहीं कर सकता — कुछ लोंगों के लिये पर्याप्त हो सकता है, पर उन लोगों के लिए नहीं हो सकता जिनकी अंतरात्मा  की अभीप्सा पूर्ण दिव्य परिवर्तन साधित करने की है।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग – २)

चैत्य पुरुष का प्रभुत्व

महर्षि श्रीअरविंद का चित्र

     एक बच्चे की तरह बन जाना और अपने-आपको संपूर्णतः  दे देना तब तक असम्भव है , जब तक कि चैत्य पुरुष का प्रभुत्व न हों और वह प्राण की अपेक्षा अधिक बलशाली न हों ।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र ( भाग – २)

अधिक पाने के लिये अभीप्सा

Sri Aurobindo photoaphed in his roomgr

मनुष्य को जो कुछ उसे मिलता है उससे संतुष्ट रहना चाहिये फिर भी शांत- रूप से, बिना संघर्ष के, और अधिक पाने के लिये अभीप्सा करनी चाहिये | जब तक सब कुछ नहीं आ जाता । कोई कामना, कोई संघर्ष नहीं – बस, होनी चाहिये अभीप्सा, श्रद्धा, उद्घाटन — और भागवत कृपा ।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र ( भाग-२)

श्री माँ की ओर खुले रहने का तात्पर्य

The Mother of Sri Aurobindo Ashram

श्री माँ की ओर खुले रहने का तात्पर्य है बराबर शांत-स्थिर और प्रसन्न बने रहना तथा दृढ़ विश्वास बनाये रखना न कि चंचल होनादुःख करना या हताश होनाअपने अंदर उनकी शक्ति को कार्य करने देना जो तुम्हारा पथ- प्रदर्शन कर सकेज्ञान,शांति और आनंद दे सके । अगर तुम अपने को खुला न रख सको तो फिर उसके लिये निरंतर पर खूब शांति से यह अभीप्सा करो कि तुम उनकी ओर खुल सको ।

सन्दर्भ : माताजी के विषय में