एक नियम

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

एक नियम मैं तुम्हारे लिए निश्चित कर सकता हूँ, ऐसा कोई काम मत करो, ऐसी कोई बात मत कहो या सोचो जिसे तुम माताजी से छिपाना चाहो।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

केवल एक ही शक्ति

श्रीअरविंद और श्रीमाँ

प्रायः ही श्रीअरविंद कहते हैं कि व्यक्ति को श्रीमाँ की शक्ति को शासन करने देना चाहिये । क्या इसका यह अर्थ है कि दोनों की शक्तियों में कुछ भेद है ?

केवल एक ही शक्ति है, माताजी की शक्ति – या , यदि तुम इसें यों कहना चाहो, माताजी श्रीअरविंद की शक्ति हैं।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

भोजन अर्पण करने का तात्पर्य

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

‘मातृवाणी’ में आये हुए इस वाक्य से माताजी का क्या मतलब है :

“जब तुम खाते हो तब तुम्हें यह अवश्य अनुभव करना चाहिये कि स्वयं भगवान ही तुम्हारें द्वारा खा रहे है ?”

 

इसका अर्थ है भोजन अहंकार या कामना को नहीं बल्कि भगवान को अर्पण करना जो सभी क्रियाओं के पीछे विद्यमान हैं।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

अपने अन्दर रहना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

अपने अन्दर माताजी के साथ रहना, उनकी चेतना के साथ संपर्क में रहना और दूसरों से केवल अपनी बाहरी स्थूल सत्ता के द्वारा ही मिलना तुम्हें सीखना होगा।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

देने का तरीका

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

श्रीमाँ दोनों तरीकों से देती हैं – नेत्रों के द्वारा चैत्य को प्रदान करती हैं और अपने हाथों द्वारा भौतिक वस्तुएँ देती हैं ।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

एक ही शक्ति

श्रीअरविंद और श्री माँ का दर्शन

एक ही शक्ति है,वह है माताजी की शक्ति-या अगर तुम इस तरह रखना चाहो कि-श्रीमाँ श्रीअरविंद की शक्ति है ।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

श्रीअरविंद और श्री माँ की और खुला होना

श्रीअरविंद और श्री माँ

क्या यह हो सकता है कि एक व्यक्ति जो श्रीअरविंद की ओर खुला है, माँ की ओर खुला न हो ? क्या यह बात ठीक है कि जो कोई भी श्रीमाँ की ओर खुला हो , वह श्रीअरविंद की ओर भी खुला है ?

श्रीमाँ के बारे में कथन सही है। यदि कोई श्रीअरविंद की ओर खुला है, लेकिन माताजी की ओर नहीं, तो उसका अर्थ यह है कि वास्तव में वह श्रीअरविंद की ओर भी खुला हुआ नहीं हैं ।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

सभी वस्तुओं की उपलब्धि 

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

भगवान ही अधिपति और प्रभु हैं – आत्म-सत्ता निष्क्रिय है, यह सर्वदा शांत साक्षी बनी रहती है और सभी वस्तुओं का समर्थन करती है – यह निश्चल पक्ष है। एक गयात्मक पक्ष भी है जिसके द्वारा भगवान कार्य करते हैं- उनके पीछे श्रीमाँ हैं। तुम्हें इसे अनदेखा नहीं करना चाहिये कि श्रीमाँ के माध्यम से ही सभी वस्तुएं उपलब्ध होती हैं।

संदर्भ : श्रीमाँ के विषय में 

माँ के साथ आन्तरिक निकटता

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

वे माँ के बालक हैं और उनके सबसे निकट हैं जो उनकी और उद्घाटित हैं, अपनी आंतरिक सत्ता में उनके समीप हैं, उनकी इच्छा के साथ एक हैं – वे नहीं जो भौतिक रूप से उनके सबसे निकट हैं ।

संदर्भ : माताजी के विषय में