शाश्वत भगवान की प्राप्ति

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

जब तक हम वर्तमान विश्व-चेतना में निवास करते हैं तब तक यह जगत, जैसा कि गीता ने कहा है, ‘अनित्यमसुखम’ है। उससे विमुख हो केवल भगवान की ओर मुड़ने और भागवत चेतना में निवास करने पर ही हम, जगत के द्वारा भी शाश्वत भगवान को प्राप्त कर सकते हैं।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र 

आध्यात्मिक स्वप्न

महर्षि श्रीअरविंद और श्रीमाँ

जब किसी साधक को आध्यात्मिक सत्य के स्वप्न आते हैं तो क्या इसका यह अर्थ नहीं होता कि उसकी प्रकृति का रूपांतर हो रहा है ?

जरूरी नहीं है। इससे यह मालूम होता है कि वह साधारण लोगों से ज्यादा सचेतन है, परंतु स्वप्न प्रकृति को नहीं बदल सकते ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र

सदा सही काम

श्रीअरविंद आश्रम की अधिस्थत्री श्री माँ

तुम सदा सही काम कर सको इसके लिए यदि तुम बहुत अधिक चाहते हो कि तुम्हें चेतना मिले और इसके लिए तुम अभीप्सा भी करते हो तो यह तुम्हें इन तरीकों में से किसी एक से प्राप्त हो सकती है :

१. तुम्हें अपनी गतियों का इस ढंग से परीक्षण करने कि आदत या क्षमता प्राप्त हो सकती है कि तुम प्रेरणा को आते हुये देख सको और साथ ही उसके स्वरूप को भी जान सको ।

२. ऐसी चेतना प्राप्त हो सकती है कि जब भी तुम्हारें अंदर बुरा विचार या बुरे काम की प्रेरणा या बुरा भाव उठे तो तुम्हें बेचैनी-से महसूस हो ।

३. जब कभी तुम कुछ बुरा काम करने लगें तो तुम्हारें अंदर कोई चीज़ तुम्हें सावधान कर दे और रोक दे ।

 

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र

श्रीकृष्ण में निवास

श्रीअरविंद और श्री कृष्ण

श्रीकृष्ण में निवास करने पर शत्रुता भी प्रेम की ही एक क्रीडा तथा भाइयों का मल्ल्युद्ध बन जाती है ।

संदर्भ : विचारमाला और सूत्रावली

 

समय की चिंता

महर्षि श्रीअरविंद का चित्र

पहले से यह निर्धारित मत करो कि तुम्हारा आदर्श किस समय और किस तरीके से पूरा होगा। कार्य करो और समय तथा तरीके को सर्वज्ञ भगवान पर छोड़ दो ।

संदर्भ : विचारमाला और सूत्रावली 

समग्र समर्पण

The Mother of Sri Aurobindo Ashram during Balcony Darshan

यदि सत्ता का कोई अंग समर्पण करे और कोई दूसरा अंग जहाँ-का-तहाँ अड़ा रह जाये, अपने ही रास्ते पर चलता चलें या अपनी शर्तों को सामने रखे तो यह समझ लो कि जब-जब ऐसा होगा तब-तब तुम आप ही उस भगवती प्रसाद-शक्ति को अपने पास से दूर हटा दोगे ।

संदर्भ : “माता”

खोज की प्रमुख शक्ति

Sri Aurobindo in his roon

जो कुछ मनुष्य सच्चाई के साथ और निरंतर भगवान् से चाहता है , उसे भगवान् अवश्य देते हैं । तब यदि तुम आनंद चाहो और लगातार चाहते रहो तो तुम अंत में उसे अवश्य प्राप्त करोगे । बस एकमात्र प्रश्न यह है कि तुम्हारी खोज की प्रमुख शक्ति क्या होनी चाहिए, कोई प्राणिक मांग अथवा कोई चैत्य अभीप्सा, जो हृदय के भीतर से प्रकट हो और मानसिक, प्राणिक तथा भौतिक चेतना तक अपने को संचारित कर दे । चैत्य अभीप्सा सबसे बड़ी शक्ति है और सबसे छोटा पथ बनाती है — और इसके अलावा, हमें अधिक शीघ्र या देर से उस पथ पर आना ही होगा ।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र ( भाग -२ )

अचंचल मन का अर्थ

Sri Aurobindo photographed in his room

अचंचल मन का अर्थ यह नही है कि उसमें कोई विचार या मनोमय गतियाँ एक- दम होगी ही नही, बल्कि यह अर्थ है कि ये सब केवल ऊपर-ही-ऊपर होंगी और तुम अपने अन्दर अपनी सत्य सत्ता को इन सबसे अलग अनुभव करोगे, जो इन सबको देखती तो है पर इनके प्रवाह में बह नही जाती, जो यह योग्यता रखती हैं कि इन सबका निरीक्षण करे और निर्णय करे तथा जिन चीजों का त्याग करना हो उन सबका त्याग करे एवं जो कुछ सत्य चेतना और सत्य अनुभूति हो उन सबको ग्रहण और धारण करे ।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के वचन (भाग – २)

अंतरात्मा का अनुसरण

महर्षि श्रीअरविंद का चित्र

यदि तुम्हारी अंतरात्मा सर्वदा रूपांतर के लिए अभीप्सा करती है तो बस उसी का अनुसरण तुम्हें करना होगा । भगवान को खोजना या यों कहें कि भगवान के किसी रूप कों चाहना — क्योंकि यदि किसी में रूपांतर साधित न हो तो वह संपूर्ण रूप से भगवान को उपलब्ध नहीं कर सकता — कुछ लोंगों के लिये पर्याप्त हो सकता है, पर उन लोगों के लिए नहीं हो सकता जिनकी अंतरात्मा  की अभीप्सा पूर्ण दिव्य परिवर्तन साधित करने की है।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग – २)

माताजी की सतत उपस्थिति

The Mother of Sri Aurobindo Ashram

माताजी की सतत उपस्थिति अभ्यास के द्वारा आती हेसाधना में सफलता पाने के लिये भागवत कृपा अत्यंत आवश्यक हैपर अभ्यास ही वह चीज है जो कृपा-शक्ति के अवतरण के लिये तैयारी करती है ।

 तुम्हें भीतर की ओर जाना सीखना होगाकेवल बाहरी चीजों में ही रहना बंद करना होगामन को स्थिर करना होगा और अपने अंदर होनेवाली माताजी की क्रिया के विषय में सचेतन होने की अभीप्सा करनी होगी ।


सन्दर्भ : माताजी के विषय में