नयी चीज़ का डर

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मधुर मां,

 हम प्रायः कोई नयी चीज करने से डरते हैं, शरीर नये तरीके से क्रिया करने से इन्कार करता है, जैसे जिम्नास्टिक्स में कोई नयी क्रिया करने या नयी तरह का गोता लगाने से। यह डर कहां से आता है? इससे कैसे पिण्ड छुड़ाया जा सकता है? और फिर, दूसरों को भी ऐसा करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जाये?

शरीर हर नयी चीज से डरता है क्योंकि उसका आधार ही है जड़ता, तमस् प्राण ही उसमें रजस् या क्रियाशीलता का प्रधान लक्षण लाता है। इसीलिए साधारण नियमानुसार महत्त्वाकांक्षा, प्रतिस्पर्धा और दर्प के रूप में प्राण की घुसपैठ शरीर को तमस को झाड़ फेंकने और प्रगति के लिए आवश्यक प्रयास करने के लिए बाधित करती है।

स्वभावतः, जिनमें मन प्रधान है वे अपने शरीर को भाषण दे-देकर भय पर विजय पाने के लिए आवश्यक सभी युक्तियां जुटा सकते हैं।

सभी के लिए सर्वोत्तम उपाय है, भगवान् के प्रति आत्मोत्सर्ग और उनकी अनन्त कृपा पर विश्वास।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

भगवान के साथ तुम्हारा संबंध

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

भगवान् के साथ जो तुम्हारा सम्बन्ध है उसमें तुम्हारा ध्यान इस बात पर नहीं होना चाहिये कि भगवान् तुम्हारी व्यक्तिगत कामनाओं को पूरा करें, ध्यान इस बात पर होना चाहिये कि तुम्हें इन सब चीजों
से बाहर खींच लाया जाये और तुम्हारी उच्चतम आध्यात्मिक सम्भावनाओं में ऊपर उठाया जाये, जिससे तुम अपने अन्दर, और उसके फलस्वरूप बाहरी सत्ता में भी, मां के साथ युक्त हो सको। यह
काम तुम्हारी प्राणगत वासनाओं को तृप्त करके नहीं किया जा सकता-उससे तो तुम्हारी वासनाएं और बढ़ जायेंगी और तुम साधारण प्रकृति के अज्ञान और उसकी अशान्त अस्तव्यस्तता के हाथों में जा
पड़ोगे। यह काम तो केवल तुम्हारे आन्तरिक विश्वास और समर्पण के द्वारा तथा तुम्हारे अन्दर काम करने वाली और तुम्हारी प्राण-प्रकृति को परिवर्तित करने वाली मां की शान्ति और शक्ति के दबाव
के द्वारा ही हो सकता है। जब तुम इसे भूल जाते हो तभी पथभ्रष्ट होते और कष्ट भोगते हो; जब तुम इसे याद रखते हो तब आगे बढ़ते हो और कठिनाइयां धीरे-धीरे हटती जाती हैं।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

निराशा से दूर रहो

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

जीवन की परिस्थितियां चाहे जैसी हों, तुम्हें सदैव निराशा से दूर रहने की सावधानी बरतनी चाहिये और फिर दुःखी, उदास और हताश रहने की यह आदत सचमुच परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि यह प्रकृति में विश्वास न होने से उत्पन्न होती है । जिस व्यक्ति में विश्वास होता है, चाहे वह केवल अपने ऊपर ही क्यों न हो,
वह सब कठिनाइयों का, सब परिस्थितियों का, अत्यधिक विपरीत परिस्थितियों कभी, बिना निरुत्साहित या निराश हुए, सामना कर सकता है। वह अन्त तक पुरुषार्थ के  साथ संघर्ष करता रहता है। जिन व्यक्तियों की प्रकृति में विश्वास नहीं होता उन्हीं में सहनशीलता और साहस का भी अभाव होता है।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

विश्वास

श्रीअरविंद और श्रीमाँ

श्रीमाँ तथा श्रीअरविंद की सहायता हमेशा तुम्हारे लिए प्रस्तुत है। तुम्हें पूरी तरह से उसके प्रति मुड़ना-भर है और वह तुम्हारे ऊपर क्रिया करेगी।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

दृढ़ श्रद्धा बनाये रखो

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

किसी भी तरह के हतोत्साह को अपने ऊपर हावी मत होने दो और ‘भागवत कृपा’ पर कभी अविश्वास न करो। तुम्हारे बाहर, तुम्हारे चारों ओर जो भी कठिनाइयाँ हैं, तुमहारें अंदर जो भी कठिनाइयाँ हैं, अगर तुम अपनी श्रद्धा और अपनी अभीप्सा पर कसी हुई पकड़ बनाये रखो, ‘गुप्त’ शक्ति तुम्हें तुम्हारी कठिनाइयों से पार निकाल कर तुम्हें यहाँ वापिस ले आयेगी। भले तुम विरोधों और कठिनाइयों के बोझ तले तब जाओ, भले तुम ठोकरों पर ठोकरों खाओ, यहाँ तक कि सामने अंधी गली जान पड़े, लेकिन अपनी अभीप्सा की पकड़ को कभी ढीला न छोड़ो, अगर कभी श्रद्धा पर बादल घिर आयें, अपने मन और हृदय में हमेशा हमारी ओर मुड जाओ और वे बादल तितर-बितर हो जायेंगे।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र 

बीमारी एक मिथ्यात्व है

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

जब शारीरिक अव्यवस्था आये तो तुम्हें डरना नहीं चाहिये, तुम्हें उससे निकल भागना नहीं चाहिये, तुम्हें उसका सामना साहस, शांति, भरोसे और इस निश्चिति के साथ करना चाहिये कि बीमारी एक मिथ्यात्व है और अगर तुम पूरे भरोसे के साथ, पूरी तरह भागवत कृपा की ओर पूर्ण अचंचलता के साथ मुड़ो तो वह कृपा इन कोषाणुओं में उसी तरह पैठ जायेगी जिस तरह वह सत्ता की गहराइयों में पैठती ही, और स्वयं कोषाणु शाश्वत सत्य और आनंद के भागीदार होंगे।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-३)

प्रार्थना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

. . . फिर भी कितने धीरज की जरूरत है ! प्रगति की अवस्थाएँ कितनी अदृश्य-सी हैं ! …

ओह ! मैं तुझे अपने हृदय की गहराइयों से कैसे पुकारती हूँ, हे सत्य ज्योति, परम-प्रेम, दिव्य स्वामी, जो हमारे प्रकाश और हमारे जीवन का उत्स, हमारा पथ-प्रदर्शक और हमारा रक्षक, हमारी आत्मा की आत्मा, हमारे प्राण का प्राण, हमारी सत्ता का हेतु, सर्वोच्च ज्ञान, अविकारी शांति  है !

संदर्भ : प्रार्थना और ध्यान 

श्रद्धा और भरोसा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

श्रद्धा भरोसे से अधिक, कहीं अधिक पूर्ण है। देखो, तुम्हें भगवान पर भरोसा है, इस अर्थ में कि तुम्हें अधिक विश्वास है कि जो कुछ उनकी ओर से आयेगा वह सदा तुम्हारी अधिकतम भलाई के लिए होगा : उनका जो भी निर्णय हो, उनकी ओर से जो भी अनुभूति आये, वे तुम्हें जिस किसी परिस्थिति में रखें, सब सदा तुम्हारे अधिक-से-अधिक भले के लिए ही होगा। यह भरोसा है। किन्तु श्रद्धा – भगवान के अस्तित्व में एक प्रकार की अडिग निश्चयता – श्रद्धा एक ऐसी वस्तु है जो सम्पूर्ण सत्ता पर अधिकार कर लेती है। यह केवल मानसिक, आन्तरात्मिक अथवा प्राणिक ही नहीं होती : वस्तुतः, श्रद्धा समूची सत्ता में होती है। श्रद्धा सीधी अनुभूति की ओर ले जाती है।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर (१९५४)

पूर्ण आत्म-दान की तीन विधियाँ

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ का चित्र

भगवान के प्रति पूर्ण आत्म-दान के लिए तीन विशेष विधियाँ :

(१) सारे गर्व को त्याग कर पूर्ण नम्रता के साथ अपने-आपको ‘उन’ के चरणों में साष्टांग प्रणत करना।

(२) अपनी सत्ता को ‘उनके’ सामने खोलना, नख से शिख तक अपने सारे शरीर को खोल देना जिस तरह किताब खोली जाती है, अपने केंद्रों को अनावृत कर देना जिससे सभी क्रियाओं की पूर्ण सच्ची निष्कपटता प्रकट हो जाये जो किसी चीज़ को छिपा नहीं रहने देती ।

(३)’उन’ की भुजाओं में आश्रय लेना, प्रेममय और सम्पूर्ण विश्वास के साथ ‘उन’ में विलीन हो जाना।

इन क्रियाओं के साथ-साथ यह तीन सूत्र या व्यक्ति के अनुसार इनमें से कोई एक अपनाया जा सकता है :

(१) ‘तेरी इच्छा’ पूर्ण हो, मेरी नहीं ।

(२) जैसी ‘तेरी इच्छा’, जैसी ‘तेरी इच्छा’ ।

(३) मैं हमेशा के लिए ‘तेरा’ हूँ।

साधारणत: जब ये क्रियाएं सच्चे तरीक़े से की जाती हैं तो इनके साथ-साथ पूर्ण एक्य, अहम का पूर्ण विलयन हो जाता है जिससे महान आनंद का जन्म होता है।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

आशाएँ

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

हमेशा ऊँचे उड़े चलो, दूर-दूर चलते चलो, बिना हिचके चलो। आज की आशाएँ कल की सिद्धियाँ होगी।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)