ज्ञान

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

ज्ञान है एक ऐसी एकाग्रता जिसकी परिणति एक जीवंत सिद्धि तथा हमारे अंदर तथा सबमें एकमात्र सत्ता की उपस्थिति – जिसके प्रति हम सचेतन हैं – के सतत बोध में हो, योग में ज्ञान तथा ज्ञान के लिए प्रयास से यही हमारा तात्पर्य है।

संदर्भ : योग समन्वय 

शुद्धि मुक्ति की शर्त है

Sri Aurobindo photographed in his room

शुद्धि मुक्ति की शर्त है। समस्त शुद्धीकरण एक छुटकारा है, एक उद्धार है; क्योंकि यह सीमित करने वाली, बंधनकारी, तमाच्छादित करने वाली अपूर्णताओं तथा भ्रांतियों को झाड़ फेंकने के बराबर है। कामना की शुद्धि चैत्य-प्राण की मुक्ति लाती है। अनुचित या ग़लत भावनाओं तथा कष्टकर प्रतिक्रियाओं का शुद्धीकरण ह्रदय की मुक्ति लाती है।  संवेदी मन के तमाच्छादित करने वाले सीमित विचार का शुद्धीकरण बुद्धि की मुक्ति लाता है । केवल बौद्धिकता का शुद्धीकरण विज्ञान की मुक्ति लाता है. . .यह सब एक यांत्रिक मुक्ति है। अंतरात्मा की मुक्ति व्यापकतर तथा अधिक तात्विक प्रकृति की मुक्ति है । यह है – पार्थिव सीमा से बाहर प्रकाश में ‘आत्मा’ की असीम अमरता में प्रकट होना।

संदर्भ : योग समन्वय 

अतिमानसिक विज्ञान

श्रीअरविंद का चित्र

जब मानसिकता पीछे छूट जाती है तथा निष्क्रिय नीरवता में दूर चली जाती है, केवल तभी अतिमानसिक विज्ञान का पूर्ण उद्घाटन और उसकी प्रभुत्व-सम्पन्न तथा समग्र क्रिया हो सकती है ।

संदर्भ : योग समन्वय 

भक्तिमार्ग का प्रथम पग

श्रीअरविंद का चित्र

…पूजा भक्तिमार्ग का प्रथम पग मात्र है। जहां बाह्य पुजा आंतरिक आराधना में परिवर्तित हो जाती है वही से शुरू होती है सच्ची भक्ति ; वह गंभीर होकर प्रगाढ़ दिव्य प्रेम का रूप धारण कर लेती है; उस प्रेम का फल होता है भगवान के साथ हमारे सम्बन्धों की घनिष्ठता का हर्ष; घनिष्ठता का हर्ष मिलन के आनंद में परिणत हो जाता है ।

संदर्भ : योग समन्वय

अतिमानसिक विज्ञान का पूर्ण उद्घाटन

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

जब मानसिकता पीछे छूट जाती है तथा निष्क्रिय नीरवता में दूर चली जाती है, केवल तभी अतिमानसिक विज्ञान का पूर्ण उद्घाटन और उसकी प्रभुत्व-सम्पन्न तथा समग्र क्रिया हो सकती है ।

संदर्भ : योग-समन्वय

साक्षी चेतना का मनोभाव

श्रीअरविंद का चित्र

… यदि वे (मानसिक तथा प्राणिक) सत्ताएँ सदा सक्रिय रहती हैं और तुम सदा उनकी गतिविधियों के साथ तदात्म रहते हो तब पर्दा सदा बना रहेगा। यह भी संभव है कि तुम अपने को अलग कर लो और इन गतिविधियों को ऐसे देखो मानों वे तुम्हारी अपनी नहीं हैं बल्कि प्रकृति की एक यांत्रिक क्रिया हैं जिसका तुम एक तटस्थ साक्षी के समान अवलोकन करते हो। तब हम एक ऐसी आंतरिक सत्ता के प्रति अवगत हो जाते हैं जो अलग है, शांत है और प्रकृति में सम्मिलित नहीं है । यह आंतरिक मनोमय या प्राणमय पुरुष हो सकता है पर चैत्य नहीं, किन्तु आंतरिक मनोमय तथा प्राणमय पुरुष की चेतना की उपलब्धि पुरुष की चेतना की उपलब्धि चैत्य पुरुष के उदघाटन की ओर सदा ही एक पग उठाने जैसा होता है ।

संदर्भ : योग समन्वय

प्रकृति की बैचेन अनिवार्यता

प्रभु श्रीअरविंद

हमारी प्रकृति भ्रांति तथा क्रिया की बेचैन अनिवार्यता के आधार पर कार्य करती है, भगवान अथाह निश्चलता में मुक्त रूप से कार्य करते हैं। यदि आत्मा पर इस निम्न प्रकृति की पकड़ को रद्द करना हैं तो हमें प्रशांति के उस अगाध तल में छलांग लगानी होगी और वही बन जाना होगा ।

संदर्भ : योग समन्वय

अहंकारी भावना

श्रीअरविंद अपने कक्ष में

स्वाभाविक है कि महानतर अनुभूतियाँ होने पर सत्ता उल्लासित हो उठती है, साथ-ही-साथ उसमें अद्भुतता तथा चमत्कार का भाव भी आ सकता है, लेकिन उल्लास में कोई अहंकारी भावना नहीं होनी चाहिये।

संदर्भ : योग समनव्य

दर्शन दिवस संदेश -१५ अगस्त २०१७ (श्रीअरविंद का जन्मदिवस)

दर्शन दिवस संदेश १५ अगस्त २०१७

श्रीअरविंद का जन्मदिन १५ अगस्त २०१७

जीवन की भांति योग में भी वही मनुष्य जो प्रत्येक पराजय एवं मोहभंग के सामने तथा समस्त प्रतिरोधपूर्ण, विरोधी ओर निषेधकारी घटनाओं एवं शक्तियों के समक्ष बिना थके-हारे अन्त तक डटा रहता है वही अन्त में विजयी होता है और देखता है कि उसको श्रद्धा सच्ची सिद्ध हुई है क्योंकि मनुष्य में रहने वाली आत्मा और दिव्य शक्ति के लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। 

-श्रीअरविंद

केवल अंश ही

महर्षि श्री अरविंद का चित्र

पूर्णयोग के साधक को यह अवश्य स्मरण रखना चाहिये कि कोई भी लिखित शास्त्र नित्य ज्ञान के केवल कुछ एक अंशों को ही प्रकट कर सकता है, चाहे उसकी प्रामाणिकता कितनी भी महान् क्यों न हो अथवा उसकी भावना कितनी भी विशाल क्यों न हो ।

संदर्भ : योग समन्वय