भगवान के प्रति उत्सर्ग

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मधुर माँ,

 आपने बहुत बार कहा है कि हमारे क्रिया-कलाप भगवान के प्रति उत्सर्ग होने चाहियें । इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या है और यह कैसे किया जा सकता है ? उदाहरण के लिए, जब हम टेनिस और बास्केट बॉल खेलते हैं तो हम इसे उत्सर्ग के रूप में कैसे कर सकते हैं? निश्चय ही मानसिक रुपायण काफी नहीं हैं  !

इसका मतलब यह है कि तुम जो कुछ करो वह व्यक्तिगत, अहंकारमय लक्ष्य के लिए, सफलता, यश, लाभ, भौतिक लाभ या गर्व के लिए न करके सेवा या उत्सर्ग-भाव से करो ताकि तुम भागवत इच्छा के बारे में ज्यादा सचेतन बन सको, अपने-आपको और भी पूरी तरह उसे सौंप सको, यहाँ तक कि तुम इतनी प्रगति कर लो कि तुम यह जान और अनुभव कर सको कि स्वयं भगवान तुम्हारे अंदर काम कर रहे हैं, उनकी शक्ति तुम्हें प्रेरित कर रही है, उनकी इच्छा तुम्हें सहारा दे रही है – यह केवल मानसिक ज्ञान न हो बल्कि चेतना की स्थिति की सच्चाई और निष्कपता और जीवंत अनुभव की शक्ति हो।

इसे संभव बनाने के लिए जरूरी है कि सभी अहंकारमय अभिप्राय और अहंकारी प्रतिक्रियाएँ गायब हो जायें।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

 

भागवत उपस्थिती का पहला चिन्ह

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

केवल शांत स्थिरता में ही सब कुछ जाना और किया जा सकता है।

जो कुछ उत्तेजना और उग्रता में किया जाता है वह मतिभ्रंश और मूर्खता है । सत्ता में भागवत उपस्थिती का पहला चिन्ह है शांति । 

संदर्भ : शिक्षा के ऊपर 

उपस्थिती का अनुभव

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मेरी प्यारी माँ, काश ! मैं अपनी अज्ञानी सत्ता को यह विश्वास दिला पाता कि तुम्हें अपने हृदय के केंद्र में पाना संभव है ।

यह तुम्हारे हृदय को विश्वास दिलाने का प्रश्न नहीं है, तुम्हें इस उपस्थिती का अनुभव होना चाहिये और तब तुम जान पाओगे कि अपनी गहराइयों में तुम्हारा हृदय सदा इस उपस्थिती के बारे में सचेतन रहा है ।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

सतत उपस्थिति

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ का चित्रा

हमेशा इस तरह रहो मानों तुम परात्पर प्रभु और भगवती माता की आंखों के एकदम नीचे हो । कोई ऐसा काम मत करोकुछ भी ऐसा सोचने और अनुभव करने की चेष्टा मत करो जो भागवत उपस्थिति के लिये अनुपयुक्त हो ।

संदर्भ : माताजी के विषय में