श्रद्धा और भरोसा का अन्तर

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ मीरा अल्फ़ासा का बहुत सुंदर चित्र

भगवान पर श्रद्धा रखने और भरोसा करनें में क्या अन्तर है ?

जैसा कि श्रीअरविंद ने लिखा है, श्रद्धा भरोसे से अधिक, कही अधिक पूर्ण है। देखो, तुम्हें भगवान पर भरोसा है, इस अर्थ में कि तुम्हें विश्वास है कि जो कुछ उनकी ओर से आयेगा वह सदा तुम्हारी अधिकतम भलाई के लिए होगा : उनका जो भी निर्णय हो, उनकी ओर से जो भी अनुभूति आये, वे तुम्हें जिस किसी परिस्थिति में रखें, सब कुछ सदा तुम्हारे अधिक-से-अधिक भले के लिए ही होगा। यह भरोसा है। किन्तु श्रद्धा – भगवान के अस्तित्व में एक प्रकार की अडिग निश्चितता – श्रद्धा एक ऐसी वस्तु है जो सम्पूर्ण सत्ता पर अधिकार कर लेती है। यह केवल मानसिक, आन्तरात्मिक अथवा प्राणिक ही नहीं होती : वस्तुतः, श्रद्धा समूची सत्ता में होती है। श्रद्धा सीधे अनुभूति की ओर ले जाती है ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

चेतना को विस्तृत कैसे करें ?

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ इन्दिरा गांधी के साथ

… जब तुम्हें लगे कि तुम पूरी तरह किसी सँकरे, सीमित विचार, इच्छा और चेतना में बंद हो, जब तुम्हें ऐसा लगे कि तुम किसी सीप में बंद हो, तो तुम किसी बहुत विशाल चीज़ के बारे में सोचने लगो, उदाहरण के लिए, समुद्र के जल की विशालता, और अगर सचमुच तुम समुद्र के बारे में सोच सको कि वह कैसे दूर, दूर, दूर, दूर तक सभी दिशाओं में फैला है, इस तरह (माताजी बाहें फैला देती हैं), कैसे तुम्हारी तुलना में वह इतनी दूर है , इतनी दूर कि तुम उसका दूसरा  तट भी नहीं देख सकते, उसके छोर के आस-पास भी नहीं पहुँच सकते, न पीछे, न आगे, न दायें, न बाएँ … वह विशाल, विशाल, विशाल, विशाल है। … तुम उसके बारे में सोचते हो और यह अनुभव करते हो कि तुम इस समुद्र पर उतरा रहे हो, इस तरह, और कहीं कोई सीमा नहीं है … । यह बहुत आसान है। तब तुम अपनी चेतना को कुछ, थोड़ा और विस्तृत कर सकते हो।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

अपने-आपको बुरा भला कहना

श्रीअरविंद और श्री माँ की दुनिया

क्या अपने-आपको  बुरा-भला  कहना प्रगति करने का अच्छा उपाय है ?

अपने-आपको बुरा भला कहना ? नहीं ,ज़रूरी नहीं है । यह उपयोगी हो सकता है, और वास्तव में कभी-कभी तुम्हारे अंदर से पूर्णता की भ्रांति को निकाल बाहर करने के लिये उपयोगी होता है । लेकिन तुम अपनी आलोचना में बहुत ऊर्जा नष्ट करते हो । ज़्यादा अच्छा यह होगा कि उस शक्ति का उपयोग प्रगति करने में किया जाये, ठोस प्रगति, कुछ अधिक उपयोगी चीज़ की जाये । उदाहरण के लिये, अगर तुम्हारे अंदर अप्रिय,भद्दे,गँवारू और क्षुब्ध करने वाले विचार हों और तुम कहो: “आह, मैं भी कैसा असहाय व्यक्ति हूँ, अभी तक मेरे अंदर ऐसे विचार हैं, यह भी क्या मुसीबत है ! ” तो ज़्यादा अच्छा यह होगा कि इस शक्ति का उपयोग तुम उन विचारों को इस तरह (संकेत) भगा देने में करो ।

यह तो सिर्फ़ पहला क़दम है । दूसरा है कुछ और सोचने की कोशिश करना, किसी और चीज़ में रस लेना : कुछ पढ़ना या मनन करना, बहरहाल, अपने मन को किसी ज़्यादा रोचक चीज़ से भरने की कोशिश करना, अपनी शक्ति का उपयोग विनाश की जगह रचना में करना ।

हाँ, समय-समय पर अपने दोष स्वीकार करने की भी ज़रूरत होती है : यह बिलकुल अनिवार्य है । लेकिन उन पर बहुत ज़्यादा ज़ोर देना ज़रूरी नहीं है । ज़रूरी यह है कि अपनी समस्त शक्ति का उपयोग उन गुणों का निर्माण करने में किया जाये जिन्हें तुम अपने अंदर चाहते हो और जो करना चाहते हो वह करते चलो । यह बहुत ज़्यादा ज़रूरी है ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर (१९५४)