पापी के पास ‘कृपा’ का आना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

पापी की सहायता के लिए ‘कृपा’ कैसे आ सकती है भला?

वह पापी को पापी बने रहने में सहायता नहीं करती! वह उसके पाप से पिण्ड छुड़ाने में उसकी मदद करती है। यानी, वह पापी को यह कह कर परे नहीं धकेल देती कि, “मैं तुम्हारे लिए कुछ नहीं करूँगी।” ‘कृपा’ तो हमेशा बनी रहती है, तब भी जब वह पापकर्म करता है, उसे पाप जारी
रखने के लिए नहीं बल्कि उसमें से निकलने के लिए ‘कृपा’ कार्य करती है।

तुम जानते हो कि इसमें और इस विचार में बहुत भेद है कि तुम ख़राब हो इसलिए “मैं तुम्हारा ख़याल नहीं रखूगी, मैं तुम्हें अपने से बहुत दूर फेंक दूंगी, और तुम्हारे साथ जो होना हो हो, मेरा इससे कोई सरोकार नहीं।” बात ऐसी नहीं है। तुम ‘कृपा’ का अनुभव भले न कर पाओ, लेकिन वह हमेशा बनी रहेगी, यहाँ तक कि बुरे से बुरा पापी भी अगर बदलना चाहे तो वह उसे बदलने के लिए, उसके पाप का इलाज करने के लिए उपस्थित रहेगी। वह उसका परित्याग नहीं करेगी, लेकिन पाप करने
में उसकी मदद नहीं करेगी। तब तो वह ‘कृपा’ नहीं होगी।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

श्रद्धा और भरोसा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

श्रद्धा भरोसे से अधिक, कहीं अधिक पूर्ण है। देखो, तुम्हें भगवान पर भरोसा है, इस अर्थ में कि तुम्हें अधिक विश्वास है कि जो कुछ उनकी ओर से आयेगा वह सदा तुम्हारी अधिकतम भलाई के लिए होगा : उनका जो भी निर्णय हो, उनकी ओर से जो भी अनुभूति आये, वे तुम्हें जिस किसी परिस्थिति में रखें, सब सदा तुम्हारे अधिक-से-अधिक भले के लिए ही होगा। यह भरोसा है। किन्तु श्रद्धा – भगवान के अस्तित्व में एक प्रकार की अडिग निश्चयता – श्रद्धा एक ऐसी वस्तु है जो सम्पूर्ण सत्ता पर अधिकार कर लेती है। यह केवल मानसिक, आन्तरात्मिक अथवा प्राणिक ही नहीं होती : वस्तुतः, श्रद्धा समूची सत्ता में होती है। श्रद्धा सीधी अनुभूति की ओर ले जाती है।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर (१९५४)

अप्रसन्नता

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ नलिनी कान्त गुप्त के साथ

जिस क्षण तुम दुःख अनुभव करने लगो उसी क्षण तुम उसके नीचे लिख सकते हो, “मैं सच्चा नहीं हूँ।” ये दो वाक्य साथ साथ चलते है

“मैं दुःखी हूँ।”

“मैं सच्चा नहीं हूँ।”

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

 

संकरे विचार से छुटकारा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

. . . जब तुम्हें लगे कि पूरी तरह किसी संकरे, सीमित विचार, इच्छा और चेतना में बंद हो, जब तुम्हें ऐसा लगे कि तुम किसी सीप में बंद हो, तो तुम किसी बहुत विशाल चीज़ के बारे में सोचने लगो, उदाहरण के लिए, समुद्र के जल की विशालता, और अगर सचमुच तुम समुद्र के बारे में सोच सको कि वह कैसे दूर, दूर, दूर दूर तक सभी दिशाओं में फैला है,  इस तरह (माताजी बाहें फैला देती हैं), कैसे तुम्हारी तुलना में वह इतनी दूर है, इतनी दूर है, इतनी दूर कि तुम उसका दूसरा तट देख भी नहीं सकते, उसके छोर के आस-पास भी नहीं पहुँच सकते, न पीछे, न आगे, न दाएँ, न बाएँ . . . वह विशाल, विशाल, विशाल, विशाल है। . . .तुम उसके बारे में सोचते हो और यह अनुभव करते हो कि तुम इस समुद्र पर उतरा रहे हो, इस तरह, और कहीं कोई सीमा नहीं है . . . . । यह बहुत आसान है। तब तुम अपनी चेतना को कुछ, थोड़ा सा विस्तृत कर सकते हो।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

अप्रसन्नता और कपट

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

तुम दुःखी, बहुत उदास, निरुत्साहित और अप्रसन्न हो जाते हो : “आज चीज़ें अनुकूल नहीं है। वे कल जैसी नहीं हैं, कल वे कितनी अद्भुत थीं; लेकिन आज वे सुखद नहीं रहीं !” क्यों ? क्योंकि कल तुम पूर्ण समर्पण की अवस्था में थे – कम या अधिक पूर्ण – और आज तुम उस अवस्था में नहीं रहे। इसलिए, कल जो चीज़ इतनी सुंदर थी वह आज सुंदर नहीं रही। तुम्हारे अंदर जो ख़ुशी थी, यह विश्वास था, यह आश्वासन था कि सब कुछ ठीक होगा, कि वह महान ‘कार्य’ सिद्ध हो जायेगा, यह निश्चिति – यह सब ढक जाता है, समझे, उसका स्थान ले लेता है एक प्रकार का संदेह, और हाँ, एक असंतोष : “चीज़ें सुंदर नहीं हैं, जगत दुष्ट है, लोग अच्छे नहीं हैं।” कभी-कभी तो बात यहाँ तक पहुँच जाती है : “आज खाना अच्छा नहीं है। यह बैरोमीटर है! तुम अपने-आपसे तुरंत कह सकते हो कि कहीं कोई कपट पैठ गया है। यह जानना बहुत आसान है, इसके लिए बहुत ज्ञानी होने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि जैसा कि श्रीअरविंद ने ‘योग के तत्व’ पुस्तक में कहा है : हम सुखी हैं या दुःखी, संतुष्ट हैं या असंतुष्ट, यह हम अच्छी तरह जानते हैं, इसके लिए अपने-आपसे पूछने की, जटिल सवाल करने की कोई ज़रूरत नहीं, हम जानते हैं ! – हाँ, तो यह बहुत सरल है ।

जिस क्षण तुम दुःख अनुभव करने लगो उसी क्षण तुम उसके नीचे लिख सकते हो, “मैं सच्चा नहीं हूँ ।” ये दो वाक्य साथ-साथ चलते हैं :

“मैं दुखी हूँ।”

“मैं सच्चा नहीं हूँ ।”

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

पक्का विश्वास

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ का दर्शन

. . . तुम्हें कभी हताश नहीं होना चाहिये । या अगर तुम बहुत बार भूल कर चुके हो तो भी तुम्हें कभी भूल न करने की इच्छा रखनी चाहिये ; और तुम्हें इस बात का पक्का विश्वास होना चाहिये कि अगर तुम अपने संकल्प पर डटे रहो, तो एक-न-एक दिन तुम कठिनाई पर विजय प्राप्त कर लोगे।

 संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

आत्मसमर्पण

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ की कहानी

… बहुत कम लोग हैं, बहुत ही कम, उनकी संख्या न के बराबर है, जो सच्ची धार्मिक भावना के साथ गिरजाघर या मंदिर जाते हैं, यानि, किसी चीज़ के लिए प्रार्थना करने या भगवान से कुछ मांगने के लिए नहीं, बल्कि अपने-आपको अर्पित करने के लिए, कृतज्ञता प्रकट करने के लिए, अभीप्सा और आत्मसमर्पण करने के लिए जाते हैं। मुश्किल से लाखों में एक ऐसा होता है। … केवल इतना जरूर है कि तुम बड़ी सद्भावना के साथ जाते हो इसलिए तुम कहते हो  : “ओह! ध्यान के लिए कितनी शांत जगह है यह ! ”

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

सचेतन अभीप्सा की अवस्था

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

अगर तुम सचेतन अभीप्सा की अवस्था में हो, बहुत सच्चे हो तो बस, तुम्हारें इर्द-गिर्द सारी चीज़ें, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से, अभीप्सा में मदद करने के लिए सुव्यवस्थित कर दी जायेंगी, यानि, या तो तुमसे प्रगति करवाने के लिए, किसी नयी चीज़ के संपर्क में लाने के लिए, या फिर तुम्हारें स्वभाव में से किसी ऐसी चीज़ को उखाड़ फेंकने के लिए मदद करेंगी जिसे विलुप्त हो जाना चाहिये। यह काफी अपूर्व बात है। अगर तुम सचमुच अभीप्सा की तीव्रता की अवस्था में होओ तो ऐसी कोई परिस्थिति नहीं जो इस अभीप्सा को चरितार्थ करने के लिए तुम्हारी सहायता करने न आये।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

निष्कपट निष्ठा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

माँ “निष्कपट” निष्ठा का क्या अर्थ है ?

निष्कपट? वह सरल, सच्ची और शंका-रहित होती है। विशेश रूप से हम बच्चे की निष्कपटता की बात करते हैं, जिसकी निष्ठा सरल और शंका रहित होती है ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

श्रद्धा और भरोसा का अन्तर

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ मीरा अल्फ़ासा का बहुत सुंदर चित्र

भगवान पर श्रद्धा रखने और भरोसा करनें में क्या अन्तर है ?

जैसा कि श्रीअरविंद ने लिखा है, श्रद्धा भरोसे से अधिक, कही अधिक पूर्ण है। देखो, तुम्हें भगवान पर भरोसा है, इस अर्थ में कि तुम्हें विश्वास है कि जो कुछ उनकी ओर से आयेगा वह सदा तुम्हारी अधिकतम भलाई के लिए होगा : उनका जो भी निर्णय हो, उनकी ओर से जो भी अनुभूति आये, वे तुम्हें जिस किसी परिस्थिति में रखें, सब कुछ सदा तुम्हारे अधिक-से-अधिक भले के लिए ही होगा। यह भरोसा है। किन्तु श्रद्धा – भगवान के अस्तित्व में एक प्रकार की अडिग निश्चितता – श्रद्धा एक ऐसी वस्तु है जो सम्पूर्ण सत्ता पर अधिकार कर लेती है। यह केवल मानसिक, आन्तरात्मिक अथवा प्राणिक ही नहीं होती : वस्तुतः, श्रद्धा समूची सत्ता में होती है। श्रद्धा सीधे अनुभूति की ओर ले जाती है ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४