पूर्णयोग

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

यह योग सत्ता के रूपांतरण का योग है, न कि मात्र आंतरिक सत्ता या भगवान की उपलब्धि का, यद्यपि इसके आधार में वह उपलब्धि ही है जिसके बिना रूपांतरण सम्भव नहीं होता। इस रूपांतर में चार तत्व हैं : चैत्य-उद्घाटन, गूह्य मार्ग के रास्ते गुज़रना, आध्यात्मिक मुक्ति, अतिमानसिक पूर्णता। अगर इन चारों में से एक भी प्राप्त नहीं हुआ तो योग अपूर्ण ही रहेगा।

संदर्भ : श्रीअरविंद (खण्ड -१२)

साधक का अंतिम लक्ष्य

श्रीअरविंद का चित्र

साधक का अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिये? क्या योगी बनना नहीं होना चाहिये ?

भगवान के साथ पूर्ण रूप से संयुक्त रहना अंतिम लक्ष्य है । जब की किसी प्रकार से भी भगवान के साथ निरंतर संयुक्त रहता है, उसे योगी कहा जा सकता है; किन्तु इस सन्यूक्ति या ऐक्य को सम्पूर्ण बनाना होगा। कुछ योगी केवल आध्यात्मिक स्तर पर संयुक्त रहते हैं, कुछ मन तथा हृदय में संयुक्त रहते हैं, कुछ प्राण में भी। हमारे योग में हमारा लक्ष्य भौतिक चेतना में तथा अतिमानसिक स्तर पर भी संयुक्त रहना हैं ।

संदर्भ :  श्रीअरविंद के पत्र (भाग-२)

मेरा योग

श्रीअरविंद का चित्र

ऐसा लगता है कि तुम्हारें अन्दर पुकार उठी है और संभवतः तुम योग करने के लिए उपयुक्त हो; लेकिन योग के अनेक पथ हैं और प्रत्येक का अपना अलग उद्देश्य तथा लक्ष्य होता है। यह तो मानी हुई बात है कि सभी पथों में कामनाओं पर विजय पाने, जीवन के सामान्य सम्बन्धों से ऊपर उठ कर अनिश्चितता से चिरस्थाई निश्चिति में निवास करने को कहा जाता है। व्यक्ति अपने स्व्पन और अपनी निद्रा, भूख और प्यास इत्यादि पर भी विजय पा सकता है। लेकिन मेरे योग में ऐसा कुछ नहीं है कि तुम जीवन से अपना संबंध काट लो, अपनी सभी इंद्रियों का हनन कर डालो या उन पर संयम का लौह अंकुश लगा दो। इस योग का उद्देश्य है – इसी जीवन में भागवत ‘सत्य’ तथा उसकी ऊर्जस्वी निश्चितताओं के ‘प्रकाश’, ‘शक्ति’ तथा आनन्द’ को जीवन में उतार कर उसका रूपान्तर करना। यह योग जगत से दूर भाग कर, तपश्चर्या का नहीं, बल्कि भागवत जीवन का योग है। पहली स्थिति में तुम्हारा लक्ष्य बस समाधि में प्रवेश करके, जगत के अस्तित्व से पूरी तरह नाता तोड़ लेना होता है।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-२)

 

 

समग्र योग का अर्थ

श्रीअरविंद का चित्र

समग्र योग इसलिए कहा गया है क्योंकि आध्यात्मिक सिद्धि तथा अनुभव की सामंजस्यपूर्ण संपूर्णता प्राप्त करना इसका लक्ष्य है। इसका लक्ष्य है भागवत सत्य का समग्र अनुभव, जिसका वर्णन गीता ‘समग्र माम’ शब्दों में करती है, भागवत सत्ता का ‘मेरा अखंडित’ स्वरूप। इसकी पद्धति है समस्त चेतना, मन, हृदय, जीवन, शरीर का उस सत्य के प्रति, भागवत सत-चित आनंद के प्रति, उसकी सत्ता तथा समस्त प्रकृति के इसके समग्र रूपांतर के प्रति समग्र उदघाटन ।

संदर्भ : श्रीअरविंद (खण्ड-१२)

 

दूर रह कर सहायता ग्रहण करना

श्रीअरविंद का चित्र

अगर वह दूर से सहायता ग्रहण नहीं कर सकता तो यहाँ रह कर योग जारी रखने की आशा कैसे कर सकता है? यह ऐसा योग है जो मौखिक निर्देशों या किसी बाहरी चीज़ पर नहीं बल्कि निर्भर करता है पूर्ण नीरवता में स्वयं को उद्घाटित करने और शक्ति तथा प्रभाव को ग्रहण करने पर। जो लोग दूर रह कर इसे ग्रहण नहीं कर सकते वे यहाँ भी उसे प्राप्त नहीं कर सकते। साथ ही, अपने अंदर निश्चलता, निष्कपटता, नीरवता, धीरज तथा लगन को प्रतिष्ठापित किए बिना यह योग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसमें बहुत-से कठिनाइयों का सामना करना होता है और उन पर पूरी तरह से और निश्चित रूप से विजय पाने में कई-कई वर्ष लग जाते हैं।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र अपने और आश्रम के विषय में 

श्रीअरविंद के योग का आरंभ

श्रीअरविंद अपने कक्ष में

मधुर माँ,

हम निश्चय के साथ कब कह सकते है कि हमने श्रीअरविंद का योग शुरू कर दिया है ?

उसका निश्चित चिन्ह क्या है ?

यह कहना असंभव है, क्योंकि हर व्यक्ति के लिए वह अलग-अलग होता है । यह इस पर निर्भर है कि तुम्हारी सत्ता का कौन-सा भाग श्रीअरविंद के प्रभाव के प्रति पहले खुलता और प्रत्युत्तर देता है ।

और कोई भी दूसरे के बारे में नहीं कह सकता ।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

कोई मंत्र नहीं

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

तुम्हारे मित्र का यह विचार कि  यहाँ से मंत्र मिलना आवश्यक है और उसके लिए उसका यहाँ आना अनिवार्य है,पूरी तरह ग़लत है। इस योग में कोई मंत्र नहीं दिया जाता । यह श्रीमाँ के प्रति चेतना का अंदर से खुलना है, और यही वास्तविक दीक्षा है ; यह केवल अभिप्सा द्वारा और माँ तथा प्राण के अंदर बेचैनी के त्याग द्वारा ही आ सकता है । इसे प्राप्त करने के लिए यहाँ आना उपाय नहीं है ।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

रूपान्तर होगा ही होगा

श्री माँ का सुंदर चित्र

क्षण- भर के लिए भी यह विश्वास करने में न हिचकिचाओ कि श्रीअरविन्द नें परिवर्तन के जिस महान् कार्य के लिए बीड़ा उठाया है उसकी पूर्णाहुति सफलता में ही होगी । क्योंकि यह वस्तुत: एक तथ्य है : हमने जो काम हाथ में लिया हैं उसके बारे में सन्देह की कोई छाया भी नहीं है… । रूपान्तर होगा ही होगा : कोई चीज उसे नहीं रोक सकती, सर्वशक्तिमान् के आदेश को कोई विफल नहीं कर सकता । समस्त शंकाशीलता और दुर्बलता को उठा फेकों और उस महान् दिवस के आने तक कुछ समय वीरता के साथ सहन करने का निश्चय करो, यह लम्बा युद्ध चिर विजय मे बदल जायेगा ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

योग के विषय में ग़लत धारणाएँ – ४

श्रीअरविंद के चरण

अतिमानसिक चेतनाके विषयमें बातें करना और उसे अपने अन्दर उतारने- की बात सोचना सबसे अधिक खतरनाक हे । यह महान् कार्य करने की पूर्ण लालसा उत्पन्न कर सकता और समतोलता नष्ट कर सकता है । साधक को जो चीज पानेकी चेष्टा करनी है वह है – भगवान की ओर पूर्ण उद्घाटन, अपनी चेतना का चैत्य रूपांतर, आध्यात्मिक रूपांतर । चेतनाके उस परिवर्तनके आवश्यक घटक हैं – स्वार्थहीनता, निष्कामभाव, विनम्रता, भक्ति, समर्पण, स्थिरता, सभता, शान्ति,अचंचल सद्हृदयता । जबतक उसमें चैत्य और आध्यात्मिक रूपांतर नहीं हो जाता, अतिमानसिक बनने की बात सोचना एक मूर्खता है और एक उद्धत मूर्खता है । यदि इन सब अहंकारपूर्ण विचारोंको प्रश्रय दिया जया तो ये केवल अहंको ही अतिरंजित कर सकते, साधनाको नष्ट कर सकते और गंभीर आध्यात्मिक विपत्तियों में ले जा सकते हैं । इन बातोंका पूर्ण रूपमें परित्याग कर देना चाहिये ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-२)

योग के विषय में ग़लत धारणाएँ – ३

महायोगी महर्षि श्रीअरविंद

योग का उद्देश्य कोई महान् योगी या अतिमानव होना नहीं है । यह योगको अहंकारपूर्ण ढंगसे ग्रहण करना है और इससे कोई भलाई नहीं हो सकती । इससे पूरी तरह बचो ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-२)