स्वप्न

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ तारा जौहर के साथ

मधुर मां,
 हम स्वप्न में अच्छे और बुरे में कैसे फर्क कर सकते हैं?

सिद्धान्त रूप में, नींद के क्रिया-कलाप का मूल्यांकन करने के लिए हमें उसी तरह की विवेक-शक्ति की जरूरत होती है जैसी जाग्रत क्रिया-कलाप को परखने के लिए।

लेकिन चूंकि हम सामान्यतः ऐसी बहुत-सी क्रियाओं को “स्वप्न” का नाम दे देते हैं जो एक-दूसरे से बहुत भिन्न होती हैं इसलिए जो चीज सबसे पहले सीखनी चाहिये वह है विभिन्न प्रकार की क्रियाओं में भेद कर सकना, यानी यह जानना कि सत्ता का कौन-सा भाग “स्वप्न” देख रहा है. हम किस क्षेत्र में “स्वप्न देख रहे है” और उस क्रिया की क्या प्रकृति है। श्रीअरविन्द ने अपने पत्रों में नींद की सभी क्रियाओं का पूरा-पूरा और विस्तृत वर्णन और स्पष्टीकरण दिया है। इस विषय का अध्ययन करने और
उसका व्यावहारिक उपयोग करने के लिए इन पत्रों को पढ़ना एक अच्छा परिचय प्राप्त है।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

सोने के पहले की प्रार्थना

श्रीअरविंद का मंत्र

(प्रभो), दिन के साथ – साथ रात में भी हमेशा मेरे साथ रहो।

वर दो कि जाग्रत अवस्था के साथ-साथ नींद में भी मैं हमेशा अपने अन्दर तुम्हारी ही उपस्थिति की वास्तविकता का अनुभव करूँ।

वर दो कि वह हमेशा बनी रहें और मेरे अन्दर वह सतत रूप से, सारे समय परम सत्य, चेतना तथा आनंद का विकास करती रहे।

संदर्भ : श्रीअरविंद (खण्ड – ३५)

बुरे स्वप्नों का इलाज़

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

नींद में प्राय: मुझे प्राण जगत के बुरे स्वप्न आते हैं। उन्हें कैसे रोका जाये ?

अपनी जाग्रत अवस्था में – उदाहरण के लिये सोने से पहले – यह संकल्प रखो कि ऐसी चीज़ें स्वप्न में न आयें। शुरू में यह विधि तुरंत सफल न होगी, पर अंत में सफलता मिलेगी। या तुम स्वप्न में अधिक सचेतन होने के लिये अभीप्सा करो।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र

आध्यात्मिक सत्य के स्वप्न

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

जब किसी साधक को आध्यात्मिक सत्य के स्वप्न आते है तो क्या इसका यह अर्थ नहीं होता कि उसकी प्रकृति का रूपांतर हो रहा है ?

जरूरी नहीं है। इससे यह मालूम होता है कि वह साधारण लोगों से ज़्यादा सचेतन है, परंतु स्वप्न प्रकृति को नहीं बादल सकते ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५५

 

सोने का सही तरीका 

श्री माँ अपने कक्ष में

सोने से पहले, जब तुम सोने के लिए लेटो, तो भौतिक रूप से अपने-आपको शिथिल करना शुरू करो (मैं इसे कहती हूं बिस्तर पर त्ता बन जाना) ।

फिर अपनी भरसक सचाई के साथ, अपने- आपको, पूर्ण शिथिलता में भगवान् के हाथों में समर्पित कर दो, और… बस इतना ही ।

जब तक तुम सफल न हो जाओ कोशिश करते रहो और फिर तुम देखोगे ।


सन्दर्भ : माताजी के वचन ( भाग – ३ )