आध्यात्मिकता प्राप्त करने का अवसर

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

भगवान् केवल इस बात की प्रतीक्षा में हैं कि उनका ज्ञान प्राप्त किया जाये, जब कि मनुष्य उन्हें सर्वत्र अपने लिए खोजता है तथा उनकी मूर्तियां गढ़ता हुआ वास्तव में व्यावहारिक रूप में केवल अपने को पाता, मन और प्राणरूपी अहं की मूर्तियां खड़ी करता, उनकी स्थापना और पूजा करता है। जब अहंरूपी इस धुरी को त्याग दिया जाता है और इस अहं का पीछा करना छोड़ दिया जाता है, तभी मनुष्य को अपने आन्तरिक और बाह्य जीवन में आध्यात्मिकता प्राप्त करने का पहला और वास्तविक अवसर मिलता है। यह काफी नहीं है, पर यह एक आरम्भ अवश्य है; यह एक सच्चा द्वार होगा-बन्द-मार्ग नहीं।…

आध्यात्मिक मनुष्य जिसकी खोज करता है वह है, अहं का त्याग करके उस आत्म-सत्ता को पाना जो सबमें एक है, पूर्ण तथा समग्र है, और उसी के अन्दर जीते हुए उसकी पूर्णता के प्रारूप में विकसित होना, पर यह ध्यान रखना है कि इसे वैयक्तिक रूप में ही करना है-यद्यपि सबको आलिंगन में लेती हुई उसकी अपनी व्यापकता तथा उसकी चेतना की परिधि के साथ।

संदर्भ  : श्रीअरविंद (खण्ड-१५)

श्रीमां जो लाना चाहती हैं

श्रीमाँ का चित्र

मैं भौतिक जगत् में, धरती पर क्या लाना चाहती हूं :

१. पूर्ण ‘चेतना’।
२. पूर्ण ‘ज्ञान’, सर्वज्ञता।
३. अजेय शक्ति, अप्रतिरोध्य और अपरिहार्य सर्वशक्तिमत्ता।
४. स्वास्थ्य, पूर्ण, निरन्तर, अटल और सदा नयी होने वाली ऊर्जा ।
५. शाश्वत यौवन, निरन्तर विकास, बाधाहीन प्रगति।
६. पूर्ण सौन्दर्य, जटिल और समग्र सामञ्जस्य।
७. अखूट, अतुल समृद्धि, इस जगत् के समस्त धन-वैभव पर अधिकार।
८. रोगमुक्त करने और सुख देने की क्षमता।
९. सभी दुर्घटनाओं से रक्षा, सभी विरोधी आक्रमणों से अभेद्यता।
१०. सभी क्षेत्रों और सभी क्रिया-कलापों में अपने-आपको व्यक्त करने की पूर्ण क्षमता।
११. भाषाओं का उपहार, अपनी बात सभी लोगों को पूरी तरह समझा सकने की क्षमता।
१२. और ‘तेरे’ कार्य की सिद्धि के लिए जो कुछ भी जरूरी हो वह सब।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

आर्थिक स्थिति

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ दुर्गा पुजा के दौरान

क्या चेतना के सुधार से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति सुस्थिर हो जाती है?

यदि “चेतना के सुधार” का मतलब है बढ़ी हुई, विशालतर चेतना, उसकी अधिक अच्छी व्यवस्था तो परिणामस्वरूप बाहरी चीज़ों पर जिनमें “आर्थिक स्थिति” भी आ जाती है, स्वाभाविक रूप से ज़्यादा अच्छा नियंत्रण होगा। लेकिन जब “ज़्यादा अच्छी चेतना” होगी तो स्वाभाविक है कि व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति के जैसी चीज़ों के साथ कम व्यस्त रहेगा।

संदर्भ :  माताजी के वचन (भाग-३)

अहंकार का त्याग

महर्षि श्रीअरविंद अपने कक्ष में

बाह्य कर्मों में अहंकार प्रायः छिपा रहता है और बिना पते लगे स्वयं को संतुष्ट करता रहता है – लेकिन, जब साधना का दबाव पड़ता है, यह अपनी उपस्थिति जताने के लिए बाध्य होता है, तब जो करना है वह है – इसका त्याग कर देना और अपने-आपको इससे मुक्त कर लेना तथा अपने कर्म का लक्ष्य मात्र दिव्य प्रभु को बना लेना।

योग का वातावरण बनायें रखना आसान नहीं होता जब कोई लगातार उन लोगों के सम्पर्क में रहे जो दूसरी चेतना में निवास करते हैं – केवल तभी जब कि बाहर, और साथ ही साथ आन्तरिक चेतना में भी व्यक्ति पूर्ण आधार बना सके कि वह किसी भी परिवेश में योग के वातावरण को पूर्णतः बनाये रख सकता है।

संदर्भ : श्रीअरविंद अपने विषय में 

क्या होगा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

एक परम चेतना है जो अभिव्यक्ति पर शासन करती हैं। निश्चय ही उसकी बुद्धि हमारी बुद्धि से बहुत महान है। इसलिए हमें यह चिंता नहीं करनी चाहिये कि क्या होगा।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

संकरे विचार से छुटकारा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

. . . जब तुम्हें लगे कि पूरी तरह किसी संकरे, सीमित विचार, इच्छा और चेतना में बंद हो, जब तुम्हें ऐसा लगे कि तुम किसी सीप में बंद हो, तो तुम किसी बहुत विशाल चीज़ के बारे में सोचने लगो, उदाहरण के लिए, समुद्र के जल की विशालता, और अगर सचमुच तुम समुद्र के बारे में सोच सको कि वह कैसे दूर, दूर, दूर दूर तक सभी दिशाओं में फैला है,  इस तरह (माताजी बाहें फैला देती हैं), कैसे तुम्हारी तुलना में वह इतनी दूर है, इतनी दूर है, इतनी दूर कि तुम उसका दूसरा तट देख भी नहीं सकते, उसके छोर के आस-पास भी नहीं पहुँच सकते, न पीछे, न आगे, न दाएँ, न बाएँ . . . वह विशाल, विशाल, विशाल, विशाल है। . . .तुम उसके बारे में सोचते हो और यह अनुभव करते हो कि तुम इस समुद्र पर उतरा रहे हो, इस तरह, और कहीं कोई सीमा नहीं है . . . . । यह बहुत आसान है। तब तुम अपनी चेतना को कुछ, थोड़ा सा विस्तृत कर सकते हो।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४

गपबाजी से सावधान

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ दर्शन देते हुये

कोई क्या कर रहा है या नहीं कर रहा इसके बारे में गप्पबाज़ी करना ग़लत है।

ऐसी गप्प को सुनना ग़लत है।

यह देखना कि यह गप्प सच है या नहीं ग़लत है।

झूठी गप्पों का शब्दों में प्रतिकार करना ग़लत है।

सारी चीज़ अपने समय को नष्ट करने और अपनी चेतना को नीचे गिराने का बहुत बुरा तरीक़ा है।

जब तक कि इस घृणित आदत को वातावरण से मिटा नहीं दिया जाता तब तक ‘आश्रम’ अपने भागवत जीवन के लक्ष्य तक कभी नहीं पहुँचेगा।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

अवतार की सम्भावना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

अवतार की सम्भावना पर विश्वास करने या न करने से प्रकट तथ्य पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

अगर भगवान किसी मानव शरीर में अभिव्यक्त होने का चुनाव करते हैं, तो मेरी समझ में नहीं आता कि कोई भी मानव विचार, स्वीकृति या अस्वीकृति उनके निर्णय में रत्ती भी भी प्रभाव कैसे डाल सकते हैं भला; और अगर वे मानव शरीर में जन्म लेते हैं, तो मनुष्यों की अस्वीकृति तथ्य को तथ्य होने से रोक नहीं सकती। तो इसमें उत्तेजित होने की बात ही क्या है ।

चेतना केवल पूर्ण शांत-स्थिरता और नीरव निश्चलता में, पक्षपातों और पसंदों से मुक्त होकर ही सत्य को देख सकती हैं ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

सन्यासी होना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

सन्यासी होना अनिवार्य नहीं है – यदि कोई ऊपरी चेतना में रहने के बजाय आन्तरिक चेतना में रहना सीख जाये, अपनी अन्तरात्मा या सच्चे व्यक्तित्व को ढूंढ सके जो कि उपरितलीय मन और प्राण की शक्तियों से आच्छन्न है और अपनी सत्ता को अतिचेतन सद्व्स्तु की ओर उद्घाटित कर सके तो यह पर्याप्त है । परंतु ऐसा करने में कोई तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि वह अपने प्रयास में पूरी तरह से सच्चा और एकमुखी न हो।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र 

एकाग्रता का मतलब

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

हमारे योग में एकाग्रता का मतलब है जब चेतना किसी विशेष स्थिति में (जैसे शांति में) या किसी क्रिया में (जैसे अभीप्सा, संकल्प, श्रीमाँ के साथ संपर्क, श्रीमाँ का नाम-जप में) केंद्रीभूत होती है । और ध्यान वह है जब आन्तरिक मन चीजों का सम्यक ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनका अवलोकन करता है ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-२)