केवल मां की ओर ताको

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

किसी भी साधक को कभी भी अयोग्यता के और निराशाजनक विचारों  नहीं पोसना चाहिये-ये एकदम से असंगत होते हैं, क्योंकि व्यक्ति की निजी योग्यता तथा गुण उसे सफल नहीं बनाते बल्कि श्रीमां की कृपा, उनकी शक्ति तथा उस कृपा के प्रति अन्तरात्मा की स्वीकृति तथा मां की परमा शक्ति की उसके अन्दर क्रिया ही साधक को सफल बनाती हैं। अन्धकार-भरे इन सभी विचारों से मुंह मोड़ लो और केवल मां की ओर ताको, परिणाम तथा अपनी इच्छा की सफलता के लिए अधीर मत बनो, बल्कि श्रद्धा और विश्वास के साथ मां को पुकारो, उनकी क्रिया को अपने अन्दर शान्ति लाने दो और प्रार्थना करो कि चैत्य उद्घाटन तथा उपलब्धि के लिए तुम्हारी प्यास कभी न बुझने पाये। यह चीज निस्सन्देह
तथा निश्चित रूप से उस पूर्ण श्रद्धा तथा प्रेम को ले आयेगी जिसे तुम खोज रहे हो।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र 

भागवत कृपा पर श्रद्धा

श्रीमाँ का दर्शन

अगर व्यक्ति के अन्दर भागवत कृपा पर श्रद्धा है कि भागवत कृपा उस पर नजर रखे हुए है और चाहे कुछ क्यों न हो जाये, भागवत कृपा तो है ही, उसकी निगरानी कर रही है, व्यक्ति इसे हमेशा सारे जीवन रख सकता है और यह हो तो सभी खतरों में से गुजर सकता है, सब प्रकार की कठिनाइयों का सामना कर सकता है और कोई उसका बाल भी बांका न कर सकेगा, क्योंकि उसे श्रद्धा है और भागवत कृपा उसके साथ है। यह अनन्तगुना शक्तिशाली, अधिक सचेतन, और अधिक स्थायी शक्ति है जो तुम्हारे शारीरिक गठन की अवस्था पर निर्भर नहीं होती, जो भागवत कृपा के सिवा किसी और पर निर्भर नहीं होती और इसलिए सत्य का सहारा लिये रहती है और कोई चीज उसे हिला नहीं सकती।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

भगवती माँ की कृपा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

तुम्हारी श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण जितने अधिक पूर्ण होंगे, भगवती मां की कृपा और रक्षा भी उतनी ही अधिक रहेगी। और जब भगवती मां की कृपा और अभय-हस्त तुम पर है तो फिर कौन-सी चीज है जो तुम्हें स्पर्श कर सके या जिसका तुम्हें भय हो? कृपा का छोटा-सा कण भी तुम्हें सब कठिनाइयों, बाधाओं और संकटों के पार ले जायेगा; क्योंकि यह मार्ग मां का है, इसलिए किसी भी संकट की परवाह किये बिना, किसी भी शत्रुता से प्रभावित हुए बिना-चाहे वह कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हो, चाहे वह इस जगत् की हो या अन्य अदृश्य जगत् की-इसकी पूर्ण उपस्थिति से घिर कर तुम अपने मार्ग पर सुरक्षित होकर आगे बढ़ सकते हो। इसका कृपा-स्पर्श कठिनाई को सुयोग में, विफलता को सफलता में और दुर्बलता को अविचल बल में परिणत कर देता है।क्योंकि भगवती मां की कृपा परमेश्वर की अनुमति है, आज हो या कल, उसका फल निश्चित है, पूर्वनिर्दिष्ट, अवश्यम्भावी और अनिवार्य है।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

नयी चीज़ का डर

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मधुर माँ,

हम प्रायः कोई नयी चीज़ करने से डरते हैं, शरीर नये तरीके से क्रिया करने से इंकार करता हैं, जैसे जिम्नास्टिक में कोई नयी क्रिया करने या नयी तरह का गोता लगाने से। यह डर कहाँ से आता है? इससे कैसे पिण्ड छुड़ाया जा सकता है? और फिर, दूसरों को भी ऐसा करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जाये?

शरीर हर नयी चीज़ से डरता है क्योंकि उसका आधार ही है जड़ता, तमस:, प्राण ही उसमें रजस या क्रियाशीलता का प्रधान लक्षण लाता है। इसलिए साधारण नियमानुसार महत्वकांक्षा, प्रतिस्पर्धा और दर्प के रूप में प्राण की घुसपैठ शरीर को तमस को झाड फेंकने और प्रगति के लिए आवश्यक प्रयास करने के लिए बाधित करती है।

स्वभावतः, जिनमे मन प्रधान है वे अपने शरीर को भाषण दे-देकर भय पर विजय पाने के लिए आवश्यक सभी युक्तियाँ जुटा सकते हैं।

सभी के लिए सर्वोत्तम उपाय है, भगवान के प्रति आत्मोसर्ग और उनकी अनंत कृपा पर विश्वास।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

भागवत शक्ति की शरण

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ अपने कक्ष में

कृपा और सुरक्षा सदा तुम्हारें साथ हैं। जब तुम किसी आंतरिक या बाह्य कठिनाई या तकलीफ में हो तो उसे अपने ऊपर हावी मत होने दो; ‘भागवत शक्ति’ की शरण में जाओ जो रक्षा करती है। अगर तुम हमेशा श्रद्धा और निष्कपट सच्चाई के साथ ऐसा करो तो तुम अपने अंदर किसी ऐसी चीज को खुलता पाओगे जो सभी सतही गड़बड़ों के बावजूद हमेशा निश्चल और शांत रहेगी ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

कृतज्ञता

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

लोगो को कृपा की क्रिया का भान तक नहीं होता जब तक कोई खतरा न आ जाये, यानी, जब तक किसी दुर्घटना का आरम्भ न हो जाये या जब दुर्घटना हो चुकी हो और वे उसमें से बच निकलें हो, तब वे सचेतन हो उठते है ; लेकिन उन्हें इस बात का भान नहीं होता, जैसे , उदाहरण के लिए, कोई यात्रा या कोई और चीज़ दुर्घटना के बिना हो जाती है तो यह कही अधिक महान कृपा है। यानी, सामंजस्य एक ऐसे ढंग से स्थापित हो जाता है कि कुछ भी नहीं हो सकता; लेकिन मन को यह बिलकुल स्वाभाविक प्रतीत होता है । जब लोग बीमार पड़ते है और जल्दी ठीक हो जाते है तो वे कृतज्ञता से भरपूर होते हैं। लेकिन जब वे स्वस्थ होते हैं तो कृतज्ञ होने का कभी विचार भी नहीं करते; फिर भी यह ज्यादा बड़ा चमत्कार है ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५६

भागवत शक्ति की शरण

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

कृपा तथा सुरक्षा हमेशा तुम्हारे साथ रहती हैं । किसी भी आन्तरिक या बाहरी कठिनाई या कष्ट को अपने ऊपर हावी मत होने दो; रक्षक ‘भागवत शक्ति’ की शरण में जाओ । अगर तुम हमेशा इसे श्रद्धा और सच्चाई के साथ करो तो तुम अपने अन्दर किसी चीज़ को खुलते हूए देखोगे जो सभी सतही विक्षुब्धताओं के बावजूद हमेशा शान्त तथा अचञ्चल बनी रहेगी ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-४)

भगवती माँ की कृपा

श्रीअरविंद आश्रम की श्री माँ

उनकी कृपा का स्पर्श कठिनाई को सुयोग में, विफलता को सफलता में और दुर्बलता को अविचल बल में परिणत कर देता है । भगवती माँ की कृपा परमेश्वर की अनुमति है, आज हो या कल, उसका फल निश्चित है , पूर्वनिर्दिष्ट अवश्यंभावी और अनिवार्य है ।

संदर्भ : “माता”

 

श्रद्धा और समर्पण

श्री अरविंद आश्रम की श्री माँ का चित्र

तुम्हारी श्रद्धा, निष्ठा और समर्पण जितने अधिक संपूर्ण होंगे उतना ही अधिक तुम कृपापात्र और सुरक्षित होओगे ! और यदि मां भगवती की कृपा और रक्षक हाथ तुम पर हों तो ऐसा क्या है जो तुम्हें स्पर्श कर सके या जिसका तुम्हें भय हो? उसका अल्पांश भी तुम्हें सकल कठिनाइयों, बाधाओं और संकटों के पार कर देगा; उससे पूरे घिरे रहने पर तो, चूंकि वह पथ मां का ही है, तुम अपने पथ पर निरापद चल सकते हो तब तुम्हें किसी संकट की चिंता नहीं, तुम्हें कोई भी वैरता छू नहीं सकती वह चाहे कितनी ही सबल क्यों न हो, इस जगत् की हो या अदृश्य जगत् की । उसका स्पर्श कठिनाई को सुयोग में, विफलता को सफलता में और दुर्बलता को अडिग बल में बदल दे सकता है । कारण, मां भगवती को अनुकंपा परमेश्वर की अनुमति है और आज या कल उसका फल निश्चित है, पूर्व निर्दिष्ट, । अवश्यंभावी और अनिवार्य है !

सन्दर्भ : माताजी के विषय में