लक्ष्य

श्रीअरविंद का चित्र

“मनुष्य जो कुछ पहले कर चुका है उसे ही हमेशा दुहराते जाना हमारा काम नहीं है, बल्कि हमें नवीन सिद्धियों और अकल्पित विजयों को प्राप्त करना है। काल, आत्मा और जगत हमें क्षेत्र के रूप में दिये गये हैं ; दृष्टि, आशा और सर्जक कल्पना हमें प्रेरणा देने के लिए हैं , संकल्प , विचार और श्रम हमारे सर्वसमर्थ साधन हैं ।

“भला वह कौन-सी-नयी चीज़ है जिसे अभी हमें प्राप्त करना है ? ‘प्रेम’, क्योंकि अब तक हमने केवल घृणा और आत्म-तृष्टि को ही पाया है; ‘ज्ञान’, क्योंकि अब तक हमने केवल भूल-भ्रांति, इंद्रियबोध और मानसिक कल्पना को ही पाया है; ‘आनंद’, क्योंकि अब तक हमनें केवल सुख-दु:ख और उदासीनता को ही पाया है; ‘शक्ति’, क्योंकि अब तक हमने केवल दुर्बलता, प्रयास और पराजित विजय को ही पाया है, ‘जीवन’, क्योंकि अब तक हमने केवल जन्म, वृद्धि और मृत्यु को ही पाया है; ‘एकता’, क्योंकि अब तक हमने केवल युद्ध और साझेदारी को ही पाया है ।

“एक शब्द में , ‘देवत्व’ ; भगवतस्वरूप में अपना पुननिर्माण । ”

संदर्भ : विचार और झाँकियाँ 

सच्चाई

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

सच्चाई का अर्थ है, अपनी सत्ता की सभी गतिविधियों को उस उच्चतम चेतना तथा उच्चतम सिद्धि तक उठाना जिन्हें पहले से ही प्राप्त कर लिया गया है।

सच्चाई हर एक से यही माँग करती है कि प्रत्येक अपनी समस्त सत्ता को – अपने सभी भागों तथा गतिविधियों के साथ – उस केंद्रीय भागवत इच्छा-शक्ति के साथ एकता तथा सामंजस्य में ढाले।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

एकता और एकरूपता की प्राप्ति

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

अपनी सत्ता में एकता और एकरूपता स्थापित करने के उपाय क्या हैं ?

अपने संकल्प को दृढ़ रखो। अपने उद्धवत भागों के साथ ऐसा व्यवहार करो जैसा कहना न मानने वाले बच्चों के साथ किया जाता है। उन पर लगातार और ध्यानपूर्वक क्रिया करते रहो, उन्हें अपनी भूल अवगत करा दो।

तुम्हारी चेतना की गहराइयों में तुम्हारे अंदर रहने वाले भगवान का मंदिर, तुम्हारा चैत्य पुरुष है। यही वह केंद्र है जिसके चारों ओर तुम्हारी सत्ता के इन सब विभिन्न भागों को, इन सब परस्पर-विरोधी गतियों को जाकर एक हो जाना चाहिये। तुम एक बार चैत्य पुरुष की चेतना को और उसकी अभीप्सा को पा लो तो इन संदेहों और कठिनाइयों को नष्ट किया जा सकता है। इस काम में कम या अधिक समय तो लगेगा, परंतु अंत में तुम सफल अवश्य होओगे।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९२९-१९३१