काम के बीच रह कर साधना

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

तुम्हारे लिए यह बिलकुल सम्भव है कि तुम घर पर और अपने काम के बीच रह कर साधना करते रहो-बहुत-से लोग ऐसा करते है। आरम्भ में बस आवश्यकता यह है कि जितना अधिक सम्भव हो उतना माताजी का स्मरण करते रहो, प्रत्येक दिन कुछ समय हृदय में उनका ध्यान करो, अगर सम्भव हो तो भगवती माता के रूप में
उनका चिन्तन करो, अपने अन्दर उनको अनुभव करने की अभीप्सा करो, अपने कर्मों को उन्हें समर्पित करो और यह प्रार्थना करो कि वे आन्तरिक रूप से तुम्हें मार्ग दिखायें और तुम्हें संभाले रखें।

यह आरम्भिक अवस्था है और बहुधा इसमें बहुत समय लग जाता है, पर यदि कोई सच्चाई और लगन के साथ इस अवस्था में से गुजरता है तो मनोवृत्ति कुछ-कुछ बदलना आरम्भ कर देती है और साधक में एक नयी चेतना खुल जाती है जो अन्तर में श्रीमां की उपस्थिति के बारे में, प्रकृति में और जीवन में होने वाली उनकी
क्रिया के बारे में, अथवा सिद्धि का दरवाजा खोल देने वाली किसी अन्य आध्यात्मिक अनुभूति के बारे में अधिकाधिक सचेतन होना आरम्भ कर देती है।

संदर्भ : श्रीअरविंद के वचन 

श्रद्धा और भरोसा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

श्रद्धा भरोसे से अधिक, कहीं अधिक पूर्ण है। देखो, तुम्हें भगवान पर भरोसा है, इस अर्थ में कि तुम्हें अधिक विश्वास है कि जो कुछ उनकी ओर से आयेगा वह सदा तुम्हारी अधिकतम भलाई के लिए होगा : उनका जो भी निर्णय हो, उनकी ओर से जो भी अनुभूति आये, वे तुम्हें जिस किसी परिस्थिति में रखें, सब सदा तुम्हारे अधिक-से-अधिक भले के लिए ही होगा। यह भरोसा है। किन्तु श्रद्धा – भगवान के अस्तित्व में एक प्रकार की अडिग निश्चयता – श्रद्धा एक ऐसी वस्तु है जो सम्पूर्ण सत्ता पर अधिकार कर लेती है। यह केवल मानसिक, आन्तरात्मिक अथवा प्राणिक ही नहीं होती : वस्तुतः, श्रद्धा समूची सत्ता में होती है। श्रद्धा सीधी अनुभूति की ओर ले जाती है।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर (१९५४)

भगवान के प्रति उत्सर्ग

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मधुर माँ,

 आपने बहुत बार कहा है कि हमारे क्रिया-कलाप भगवान के प्रति उत्सर्ग होने चाहियें । इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या है और यह कैसे किया जा सकता है ? उदाहरण के लिए, जब हम टेनिस और बास्केट बॉल खेलते हैं तो हम इसे उत्सर्ग के रूप में कैसे कर सकते हैं? निश्चय ही मानसिक रुपायण काफी नहीं हैं  !

इसका मतलब यह है कि तुम जो कुछ करो वह व्यक्तिगत, अहंकारमय लक्ष्य के लिए, सफलता, यश, लाभ, भौतिक लाभ या गर्व के लिए न करके सेवा या उत्सर्ग-भाव से करो ताकि तुम भागवत इच्छा के बारे में ज्यादा सचेतन बन सको, अपने-आपको और भी पूरी तरह उसे सौंप सको, यहाँ तक कि तुम इतनी प्रगति कर लो कि तुम यह जान और अनुभव कर सको कि स्वयं भगवान तुम्हारे अंदर काम कर रहे हैं, उनकी शक्ति तुम्हें प्रेरित कर रही है, उनकी इच्छा तुम्हें सहारा दे रही है – यह केवल मानसिक ज्ञान न हो बल्कि चेतना की स्थिति की सच्चाई और निष्कपता और जीवंत अनुभव की शक्ति हो।

इसे संभव बनाने के लिए जरूरी है कि सभी अहंकारमय अभिप्राय और अहंकारी प्रतिक्रियाएँ गायब हो जायें।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

 

श्रद्धा और भरोसा का अन्तर

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ मीरा अल्फ़ासा का बहुत सुंदर चित्र

भगवान पर श्रद्धा रखने और भरोसा करनें में क्या अन्तर है ?

जैसा कि श्रीअरविंद ने लिखा है, श्रद्धा भरोसे से अधिक, कही अधिक पूर्ण है। देखो, तुम्हें भगवान पर भरोसा है, इस अर्थ में कि तुम्हें विश्वास है कि जो कुछ उनकी ओर से आयेगा वह सदा तुम्हारी अधिकतम भलाई के लिए होगा : उनका जो भी निर्णय हो, उनकी ओर से जो भी अनुभूति आये, वे तुम्हें जिस किसी परिस्थिति में रखें, सब कुछ सदा तुम्हारे अधिक-से-अधिक भले के लिए ही होगा। यह भरोसा है। किन्तु श्रद्धा – भगवान के अस्तित्व में एक प्रकार की अडिग निश्चितता – श्रद्धा एक ऐसी वस्तु है जो सम्पूर्ण सत्ता पर अधिकार कर लेती है। यह केवल मानसिक, आन्तरात्मिक अथवा प्राणिक ही नहीं होती : वस्तुतः, श्रद्धा समूची सत्ता में होती है। श्रद्धा सीधे अनुभूति की ओर ले जाती है ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५४