अंतरात्मा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मधुर माँ,

अंतरात्मा की क्या भूमिका है ?

अंतरात्मा के बिना तो हमारा अस्तित्व ही न होगा !

अंतरात्मा वह है जो कभी भी भगवान को छोड़े बिना उनसे आती है और अभिव्यक्त होना बन्द किये बिना उनके पास लौट जाती है ।

अंतरात्मा भगवान है जिसे भगवान होना छोड़े बिना व्यक्ति बनाया गया है ।

अंतरात्मा में व्यक्ति और भगवान शाश्वत रूप से एक हैं; अंत:, अपनी अंतरात्मा को पाने का अर्थ है भगवान को पाना, अपनी अंतरात्मा के साथ तादाम्य पाने का अर्थ है भगवान के साथ एक होना।

अतः, यह कहा जा सकता है कि अंतरात्मा का कार्य है मनुष्य को एक सच्ची सत्ता बनाना ।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)

अंतरात्मा की भूमिका

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

मधुर माँ,

अंतरात्मा की क्या भूमिका है ?

अंतरात्मा के बिना तो हमारा अस्तित्व ही न होगा !

अंतरात्मा वह है जो कभी भी भगवान को छोड़े बिना उनसे आती है और अभिव्यक्त होना बन्द किये बिना उनके पास लौट जाती है।

अंतरात्मा भगवान है जिसे भगवान होना छोड़े बिना व्यक्ति बनाया गया है।

अंतरात्मा में व्यक्ति और भगवान शाश्वत रूप से एक हैं; अतः, अपनी अंतरात्मा को पाने को अर्थ है भगवान को पाना, अपनी अंतरात्मा के साथ तादाम्य पाने का अर्थ है भगवान के साथ एक होना।

अतः, यह कहा जा सकता है कि अंतरात्मा का कार्य है मनुष्य को एक सच्ची सत्ता बनाना।

संदर्भ : श्रीमातृवाणी  (खण्ड -१६)

 

अहंकार और अन्तरात्मा

श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ के चरण

अहंकार उसके बारे में सोचता है जो उसके पास नहीं है और जिसे वह चाहता है। यही उसका निरन्तर  मुख्य काम है ।

अन्तरात्मा जानती है कि उसे क्या दिया जाता है और वह अनन्त कृतज्ञता में निवास करती है।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

अंतरात्मा का अनुसरण

महर्षि श्रीअरविंद का चित्र

यदि तुम्हारी अंतरात्मा सर्वदा रूपांतर के लिए अभीप्सा करती है तो बस उसी का अनुसरण तुम्हें करना होगा । भगवान को खोजना या यों कहें कि भगवान के किसी रूप कों चाहना — क्योंकि यदि किसी में रूपांतर साधित न हो तो वह संपूर्ण रूप से भगवान को उपलब्ध नहीं कर सकता — कुछ लोंगों के लिये पर्याप्त हो सकता है, पर उन लोगों के लिए नहीं हो सकता जिनकी अंतरात्मा  की अभीप्सा पूर्ण दिव्य परिवर्तन साधित करने की है।

सन्दर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग – २)