सूक्ष्म भौतिक आवरण


श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

रोग चाहे किसी कारण से क्यों न हुआ हो, वह चाहे स्थूल-भौतिक हो या मानसिक, बाह्य हो या आन्तरिक, उसे भौतिक शरीर पर असर करने से पहले सत्ता के उस स्तर में प्रवेश करना पड़ता है जो शरीर के चारों ओर लिपटा दया है और उसकी रक्षा करता है। इस सूक्ष्मतर स्तर के भिन्न-भिन्न धमों में भिन्न-भिन्न नाम हैं, कोई उसे आकाश-शरीर कहता है तो कोई नाडी-कवच। यह है तो सूक्ष्म शरीर, फिर भी लगभग दृष्टिगम्य है। किसी अत्यन्त उष्ण और उबलते हुए द्रव्य के चारों ओर जो घने कम्पन दिखायी देते हैं यह उन्हीं के जैसा घना होता है। यह भौतिक शरीर में से ही पैदा होता है और उससे सटा हआ रह कर उसे चारों ओर से ढांके रहता है। बाह्य जगत् के साथ समस्त
व्यवहार इसी माध्यम द्वारा होता है और इस कवच-शरीर पर आक्रमण करके इसका भेदन करने पर ही कोई चीज स्थूल शरीर तक असर पहुंचा सकती है। यदि यह कवच पूर्ण रूप से सशक्त और सुरक्षित हो तो तुम बुरे-से-बुरे रोगों से आक्रान्त स्थानों में भी, यहां तक कि प्लेग और हैजा के स्थानों में जाकर भी, सर्वथा रोगमुक्त रह सकते हो। जब तक यह समग्र और सम्पूर्ण रहता है, इसकी बनावट अखण्ड रहती है और इसके तत्त्व पूर्ण सन्तुलन में रहते हैं तब तक यह रोग के समस्त सम्भावित आक्रमणों से हमारी सम्पूर्ण रक्षा करता रहता है। एक ओर तो यह कवच-शरीर जड़-प्रकृति के आधार पर या यों कहें कि स्थूल-भौतिक द्रव्य के नहीं, बल्कि जड़-प्राकृतिक अवस्थाओं के आधार पर बना है, दूसरी ओर इसके निर्माण-तत्त्व हमारी मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं के कम्पन हैं। यह दूसरा पार्श्व शान्ति, समचित्तता और विश्वास,
स्वस्थता में श्रद्धा, क्षोभरहित विश्रान्ति की अवस्था और प्रफुल्लता तथा तेजोमय हर्ष के तत्त्वों द्वारा बना होता है, और ये ही तत्त्व इस कवच-शरीर को शक्ति और सार प्रदान करते हैं। यह कवच-शरीर अत्यन्त संवेदनशील माध्यम है। और इसमें प्रतिक्रियाएं सहज और तुरन्त होती हैं; यह सब तरह के सुझावों को तुरन्त अंगीकार कर लेता है और वे इसकी अवस्था में द्रुत परिवर्तन कर सकते हैं, इसका ढांचा भी लगभग बदल सकते हैं। इस पर बुरे सुझावों का अत्यधिक असर पड़ता है; उसी प्रकार यदि कोई अच्छा सुझाव हो तो वह भी उसी बल के साथ इस पर अच्छाई की दिशा में काम करता है। निराशा और निरुत्साह का इस पर बहुत बुरा असर होता है; वे मानों इसमें अन्दर तक जगह-जगह छेद कर देते हैं, इसे दुर्बल और प्रतिरोध-शक्तिविहीन बना देते हैं, फलतः विरोधी आक्रमणों के लिए एक सहज मार्ग खुल जाता है।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९२९-१९३१


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