गपबाजी


श्रीअरविंद आश्रम की श्रीमाँ

हर दुर्भावनापूर्ण शब्द, हर मिथ्यापवाद चेतना की अधोगति है।

और जब यह मिथ्यापवाद भद्दी भाषा और गंवारू शब्दों में प्रकट किया जाता है तो यह आत्मघात के समान होता है-अपनी अन्तरात्मा के आत्मघात के समान।

जब अज्ञान में तुम औरों का बुरा बोलते हो तो तुम अपनी चेतना को भ्रष्ट और अन्तरात्मा को पदच्युत करते हो।

जो ‘सत्य’ की सेवा करने के लिए जीता है उस पर बाह्य परिस्थितियों का कोई असर नहीं होता।

जब तक कि तुम किसी के पक्ष में और किसी के विपक्ष में हो, तुम निश्चित रूप से ‘सत्य’ के बाहर हो।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)


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