चेतना

चाहे तुम ध्यान लगा कर बैठो या घूमो-फिरो और काम काज करो, जिस बात की तुमसे अपेक्षा की जाती है वह है चेतना । यही एकमात्र आवश्यकता है – भगवान के बारे में सदा सचेतन रहना।

संदर्भ : पहले की बातें 

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