जन्म का चमत्कार

मैंने देखा मेरी आत्मा है एक यात्री , काल के आर-पार ;

जीवन, प्रति जीवन करती ब्रह्मांड-पथ पर पद-सञ्चार,

अतलान्तों में प्रछन्न और शिखरों पर अति उन्नत ,

कीट से ईश्वर में होती हुई विकसित।

 

शाश्वत अग्नि की एक चिंगारी, यह आयी

भौतिक में उस अजात के लिए निर्मित करने एक भवन।

मुक और परित्यक्त पदार्थों के कठोर बीज में,

अवचेतन असूर्या रात्रि ने ज्योति का किया अभिवन्दन।

 

जीवन मेँ गति हुई और मानस ने चमकते आकार का किया रेखांकन

जब तक निद्राचारी प्रकृति की नींद से उत्पन्न,

एक मानसिक प्राणी आशा और प्रेम की सामर्थ्य से सम्पन्न

नीतान्त निर्जीव पृथ्वी पर कर सके सञ्चरण ।

 

अब भी धीमी गति से हो रहा चमत्कार्य ,

पंक और प्रस्तर मेँ से क्रमश: जन्म ले रहा अमर्त्य।

 

संदर्भ : श्रीअरविंद का काव्य (अनुवाद – अमृता भारती )


(परिशिष्ट :  श्रीअरविंद के काव्य का लावण्य उनके द्वारा लिखी गयी मूल कविता के पाठ करे बिना  अधूरा है  , सो आज उनकी इसी कविता का मूल रूप अँग्रेजी में भी प्रस्तुत है !)

 

The Miracle of Birth

 

I saw my soul a traveller through Time;
From life to life the cosmic ways it trod,
Obscure in the depths and on the heights sublime,
Evolving from the word into the god.

A spark of the eternal Fire, it came
To build a house in Matter for the Unborn.
The inconscient sunless Night received the flame;
In the brute seed of things dumb and forlorn.

Life stirred and Thought outlined a gleaming shape
Till on the stark inanimate earth could move,
Born to somnambulist Nature in her sleep
A thinking creature who can hope and love.

Still by slow steps the miracle goes on,
The Immortal’s gradual birth mid mire and stone.

 

 

 

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