सतत ‘उपस्थिती’

हमेशा ऐसे जियो मानों तुम ‘परम प्रभु’ तथा  ‘भगवती माँ’ की दृष्टि के सामने हो । ऐसी कोई क्रिया न करो, ऐसी कोई चीज सोचने या अनुभव करने की चेष्टा मत करो जो ‘भागवत उपस्थिती’ के सम्मुख करने-योग्य न हो ।

संदर्भ : माताजी के विषय में 

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