अविश्वासी मन

अविश्वासी सन सर्वदा संदेह करता है, क्योंकि वह समझ नहीं सकता; परन्तु भगवत्-प्रेमी का विश्वास जानने के लिये आग्रह करता है यद्यपि  समझ नहीं पाता । हमारे अन्धकार के लिये ये दोनों ही आवश्यक हैं । परन्तु इस विषय में कोई सन्देह नहीं कि उन दोनों में से अधिक शक्तिशाली कौन है । जिसे मै अभी नहीं समझ पाता उसे किसी दिन आयत्त कर लूंगा, पर यदि मैं विश्वास और प्रेम को ही खो बेठूँ तो एकदम उस लक्ष्य से भ्रष्ट हो जाऊंगा जिसे भगवान् ने मेरे सामने रखा है ।

संदर्भ : विचार और सूत्र 

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