पूर्ण समता

जिन घटनाओं की हम प्रतीक्षा नहीं करते, जिनकी हम आशा या इच्छा नहीं करते, जो हमारी इच्छाओं के विरुद्ध होती है उन्हें ही हम अज्ञानवश दुर्भाग्य कहते हैं और फिर रोते-धोते हैं । किंतु यदि हम ज़रा अधिक बुद्धिमान बनकर इन घटनाओं के गंभीर परिणामों का निरीक्षण करें तो पता चलेगा कि ये हमें अपने भगवान् की ओर, अपने प्रिय की ओर, शीघ्र ले जाती हैं ; जब कि सुखकर और सुगम परिस्थितियां हमें रास्ते पर भटकने के लिये उत्साहित करती हैं, जो सुख के फूल मार्ग में आते है उन्हें चुनने के लिये हमें वहीं रोक देती हैं । हम अत्यधिक दुर्बल है और इतने सच्चे नहीं है कि उन्हें पूरे संकल्प के साथ अस्वीकार कर दें ताकि वे हमें आगे बढ़ने से रोक न सकें ।

यदि व्यक्ति बिना डगमगाये अपनी सफलता और उससे संबंधित सब सुखों में स्थिर रहना चाहता है तो उसे काफ़ी मजबूत होने के साथ-साथ रास्ते पर काफी आगे बढ़ा हुआ भी होना चाहिये । जो लोग यह कर सकते हैं, जो लोग मजबूत होते हैं, वे सफलता के पीछे नहीं दौड़ते, न उसकी. चाह करते है, वरन् वे उदासीनता के साथ इसे स्वीकार करते है । कारण, वे दुःख और दुर्भाग्य के कोड़ों का मूल्य जानते और उसकी सराहना कर सकते हैं ।

किंतु सब कुछ देख लेने पर सच्ची वृत्ति होगी आत्मा की पूर्ण समता, जो हमें सफलता और असफलता को, सौभाग्य और दुर्भाग्य को, प्रसन्नता और अप्रसन्नता को समान रूप से शांतिपूर्ण आनंद के साथ स्वीकार करने के योग्य बनाती है । यह वृत्ति इस बात का चिह्न और प्रमाण है कि व्यक्ति अपने लक्ष्य के निकट है । कारण, तब ये सब चीज़ें हमारे लिये ऐसे चमत्कार- पूर्ण उपहार बन जाती है जिन्हें, प्रभु अपनी असीम हित-चिन्ता भाव में हम पर बरसाते  है ।

संदर्भ : विचार और सूत्र के प्रसंग में

प्रातिक्रिया दे