योग के विषय में ग़लत धारणाएँ – ४

अतिमानसिक चेतनाके विषयमें बातें करना और उसे अपने अन्दर उतारने- की बात सोचना सबसे अधिक खतरनाक हे । यह महान् कार्य करने की पूर्ण लालसा उत्पन्न कर सकता और समतोलता नष्ट कर सकता है । साधक को जो चीज पानेकी चेष्टा करनी है वह है – भगवान की ओर पूर्ण उद्घाटन, अपनी चेतना का चैत्य रूपांतर, आध्यात्मिक रूपांतर । चेतनाके उस परिवर्तनके आवश्यक घटक हैं – स्वार्थहीनता, निष्कामभाव, विनम्रता, भक्ति, समर्पण, स्थिरता, सभता, शान्ति,अचंचल सद्हृदयता । जबतक उसमें चैत्य और आध्यात्मिक रूपांतर नहीं हो जाता, अतिमानसिक बनने की बात सोचना एक मूर्खता है और एक उद्धत मूर्खता है । यदि इन सब अहंकारपूर्ण विचारोंको प्रश्रय दिया जया तो ये केवल अहंको ही अतिरंजित कर सकते, साधनाको नष्ट कर सकते और गंभीर आध्यात्मिक विपत्तियों में ले जा सकते हैं । इन बातोंका पूर्ण रूपमें परित्याग कर देना चाहिये ।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग-२)

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